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Rigveda Mandal 6 / Sukta 38 / Mantra 1

75 Sukta
5 Mantra
6/38/1
Devata- इन्द्र: Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अपा॑दि॒त उदु॑ नश्चि॒त्रत॑मो म॒हीं भ॑र्षद्द्यु॒मती॒मिन्द्र॑हूतिम्। पन्य॑सीं धी॒तिं दैव्य॑स्य॒ याम॒ञ्जन॑स्य रा॒तिं व॑नते सु॒दानुः॑ ॥१॥

अपा॑त् । इ॒तः । उत् । ऊँ॒ इति॑ । नः॒ । चि॒त्रऽत॑मः । म॒हीम् । भ॒र्ष॒त् । द्यु॒ऽमती॑म् । इन्द्र॑ऽहूतिम् । पन्य॑सीम् । धी॒तिम् । दैव्य॑स्य । याम॑न् । जन॑स्य । रा॒तिम् । व॒न॒ते॒ । सु॒ऽदानुः॑ ॥

Mantra without Swara
अपादित उदु नश्चित्रतमो महीं भर्षद्द्युमतीमिन्द्रहूतिम्। पन्यसीं धीतिं दैव्यस्य यामञ्जनस्य रातिं वनते सुदानुः ॥

अपात्। इतः। उत्। ऊँ इति। नः। चित्रऽतमः। महीम्। भर्षत्। द्युऽमतीम्। इन्द्रऽहूतिम्। पन्यसीम्। धीतिम्। दैव्यस्य। यामन्। जनस्य। रातिम्। वनते। सुऽदानुः ॥१॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 10 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
जो (अपात्) पैरों से रहित (इतः) प्राप्त हुआ (चित्रतमः) अत्यन्त अद्भुत गुण, कर्म्म और स्वभाववाला (सुदानुः) उत्तम दानवाला (नः) हम लोगों के लिये (द्युमतीम्) विद्या के प्रकाशवाली (इन्द्रहूतिम्) अत्यन्त ऐश्वर्य्य की प्रकाशिका (पन्यसीम्) प्रशंसा करने योग्य (दैव्यस्य) श्रेष्ठ गुण अथवा विद्वानों में हुए (जनस्य) मनुष्य की (धीतिम्) धारणा से युक्त बुद्धि को और (महीम्) महती वाणी को तथा (यामन्) चलते हैं जिसमें उस मार्ग में (रातिम्) दान को (उत्, भर्षत्) धारण करता (उ) और (वनते) सेवन करता है, वह विद्वान् मङ्गल करनेवाला होता है ॥१॥
Essence
हे मनुष्यो ! जिस यथार्थवक्ता विद्वान् की सब के ऊपर दया, विद्यादान, निष्कपटता और उत्तम दृष्टि वर्त्तमान है, वही सब से सत्कार करने योग्य होता है ॥१॥
Subject
अब पाँच ऋचावाले अड़तीसवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में मनुष्यों को कैसे विद्वान् की सेवा करनी चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥