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Rigveda Mandal 6 / Sukta 37 / Mantra 5

75 Sukta
5 Mantra
6/37/5
Devata- इन्द्र: Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
इन्द्रो॒ वाज॑स्य॒ स्थवि॑रस्य दा॒तेन्द्रो॑ गी॒र्भिर्व॑र्धतां वृ॒द्धम॑हाः। इन्द्रो॑ वृ॒त्रं हनि॑ष्ठो अस्तु॒ सत्वा ता सू॒रिः पृ॑णति॒ तूतु॑जानः ॥५॥

इन्द्रः॑ । वाज॑स्य । स्थवि॑रस्य । दा॒ता । इन्द्रः॑ । गीः॒ऽभिः । व॒र्ध॒ता॒म् । वृ॒द्धऽम॑हाः । इन्द्रः॑ । वृ॒त्रम् । हनि॑ष्ठः । अ॒स्तु॒ । सत्वा॑ । आ । ता । सू॒रिः । पृ॒ण॒ति॒ । तूतु॑जानः ॥

Mantra without Swara
इन्द्रो वाजस्य स्थविरस्य दातेन्द्रो गीर्भिर्वर्धतां वृद्धमहाः। इन्द्रो वृत्रं हनिष्ठो अस्तु सत्वा ता सूरिः पृणति तूतुजानः ॥

इन्द्रः। वाजस्य। स्थविरस्य। दाता। इन्द्रः। गीःऽभिः। वर्धताम्। वृद्धऽमहाः। इन्द्रः। वृत्रम्। हनिष्ठः। अस्तु। सत्वा। आ। ता। सूरिः। पृणति। तूतुजानः ॥५॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 9 Mantra » 5

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Meaning
हे मनुष्यो ! जो (इन्द्रः) विद्या और ऐश्वर्य्य से युक्त और (स्थविरस्य) स्थूल (वाजस्य) अन्न आदि का (दाता) देनेवाला और जो (इन्द्रः) विद्या और ऐश्वर्य्य से युक्त राजा (गीर्भिः) वाणियों से (वर्धताम्) बढ़े और (वृद्धमहाः) वृद्धों से सत्कार किया (इन्द्रः) सूर्य्य (वृत्रम्) मेघ का जैसे वैसे शत्रुओं का (हनिष्ठः) अत्यन्त मारनेवाला (अस्तु) हो और जो (तूतुजानः) शीघ्र करनेवाला (सत्वा) सतोगुण से युक्त (सूरिः) विद्वान् (ता) उन धनों को (आ, पृणति) अच्छे प्रकार सुखयुक्त करता है, उसका तुम सब लोग सत्कार करो ॥५॥
Essence
हे मनुष्यो ! जो अभय का देनेवाला, विद्या में वृद्धों और आप्तों का सेवक, दुष्टों का मारनेवाला, शीघ्रकर्त्ता, विद्वान् मनुष्य हो, उसी को तुम लोग राजा मानो ॥५॥ इस सूक्त में इन्द्र, राजा और प्रजा के कर्म्मों का वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह सैंतीसवाँ सूक्त और नवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

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