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Rigveda Mandal 6 / Sukta 37 / Mantra 4

75 Sukta
5 Mantra
6/37/4
Devata- इन्द्र: Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
वरि॑ष्ठो अस्य॒ दक्षि॑णामिय॒र्तीन्द्रो॑ म॒घोनां॑ तुविकू॒र्मित॑मः। यया॑ वज्रिवः परि॒यास्यंहो॑ म॒घा च॑ धृष्णो॒ दय॑से॒ वि सू॒रीन् ॥४॥

वरि॑ष्ठः । अ॒स्य॒ । दक्षि॑णाम् । इ॒य॒र्ति॒ । इन्द्रः॑ । म॒घोना॑म् । तु॒वि॒कू॒र्मिऽत॑मः । यया॑ । व॒ज्रि॒ऽवः॒ । प॒रि॒ऽयासि॑ । अंहः॑ । म॒घा । च॒ । धृ॒ष्णो॒ इति॑ । दय॑से । वि । सू॒रीन् ॥

Mantra without Swara
वरिष्ठो अस्य दक्षिणामियर्तीन्द्रो मघोनां तुविकूर्मितमः। यया वज्रिवः परियास्यंहो मघा च धृष्णो दयसे वि सूरीन् ॥

वरिष्ठः। अस्य। दक्षिणाम्। इयर्ति। इन्द्रः। मघोनाम्। तुविकूर्मिऽतमः। यया। वज्रिऽवः। परिऽयासि। अंहः। मघा। च। धृष्णो इति। दयसे। वि। सूरीन् ॥४॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 9 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (वज्रिवः) प्रशंसित शस्त्र और अस्त्र से तथा (धृष्णो) दृढ़ उत्साह से युक्त ! (यया) जिस दक्षिणा से आप (अंहः) अपराध का (परियासि) सब प्रकार से परित्याग करते हो (सूरीन्) विद्वानों (मघा, च) और धनों को (वि) विशेष करके (दयसे) देते हो उस (अस्य) इस राज्य के (मघोनाम्) बहुत धनों से युक्तों की (दक्षिणाम्) बढ़ानेवाली दक्षिणा को (तुविकूर्मितमः) अत्यन्त बहुत करने और (वरिष्ठः) अत्यन्त स्वीकार करनेवाले (इन्द्रः) राजा हुए आप (इयर्त्ति) प्राप्त होते हैं, इससे सत्कार करने योग्य हैं ॥४॥
Essence
वही राजा स्थिर राज्य करने योग्य है जो विद्वानों और धार्मिक जनों पर दया करता और दुष्ट व्यसनों का त्याग करता है तथा पुरुषार्थी होकर दूतरूप चक्षुवाला हुआ प्रजाके पालन में यत्नवाला होता है ॥४॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥