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Rigveda Mandal 6 / Sukta 37 / Mantra 1

75 Sukta
5 Mantra
6/37/1
Devata- इन्द्र: Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ॒र्वाग्रथं॑ वि॒श्ववा॑रं त उ॒ग्रेन्द्र॑ यु॒क्तासो॒ हर॑यो वहन्तु। की॒रिश्चि॒द्धि त्वा॒ हव॑ते॒ स्व॑र्वानृधी॒महि॑ सध॒माद॑स्ते अ॒द्य ॥१॥

अ॒र्वाक् । रथ॑म् । वि॒श्वऽवा॑रम् । ते॒ । उ॒ग्र॒ । इन्द्र॑ । यु॒क्तासः॑ । हर॑यः । व॒ह॒न्तु॒ । की॒रिः । चि॒त् । हि । त्वा॒ । हव॑ते । स्वः॑ऽवान् । ऋ॒धी॒महि॑ । स॒ध॒ऽमादः॑ । ते॒ । अ॒द्य ॥

Mantra without Swara
अर्वाग्रथं विश्ववारं त उग्रेन्द्र युक्तासो हरयो वहन्तु। कीरिश्चिद्धि त्वा हवते स्वर्वानृधीमहि सधमादस्ते अद्य ॥

अर्वाक्। रथम्। विश्वऽवारम्। ते। उग्र। इन्द्र। युक्तासः। हरयः। वहन्तु। कीरिः। चित्। हि। त्वा। हवते। स्वःऽवान्। ऋधीमहि। सधऽमादः। ते। अद्य ॥१॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 9 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (उग्र) तेजस्विन् (इन्द्र) प्रजा के स्वामिन् ! जो (युक्तासः) नियुक्त किये गये (हरयः) घोड़ों के तुल्य शिल्पी मनुष्य (ते) आपके (विश्ववारम्) सम्पूर्ण सुख स्वीकार करनेवाले (रथम्) सुन्दर वाहन को (वहन्तु) प्राप्त करावें और जो (स्वर्वान्) बहुत सुख विद्यमान जिसमें वह (कीरिः) स्तुति करनेवाला विद्वान् (हि) ही (त्वा) आपको (हवते) पुकारता है उनके (सधमादः) तुल्य स्थानवाले हम लोग (ऋधीमहि) समृद्ध होवें। और जिन (ते) आपके (अर्वाक्) पीछे (अद्य) इस समय जो सुख को प्राप्त होते हैं, वे (चित्) भी इस समय सुखों से भूषित होते हैं ॥१॥
Essence
जो राजा धार्मिक और अनुकूल मनुष्यों को सत्कार करता है, उसकी सब धर्मिष्ठ विद्वान् सदा सेवा करते हैं ॥१॥
Subject
अब पाँच ऋचावाले सैंतीसवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में मनुष्य क्या करें, इस विषय को कहते हैं ॥