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Rigveda Mandal 6 / Sukta 36 / Mantra 4

75 Sukta
5 Mantra
6/36/4
Devata- इन्द्र: Rishi- नरः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
स रा॒यस्खामुप॑ सृजा गृणा॒नः पु॑रुश्च॒न्द्रस्य॒ त्वमि॑न्द्र॒ वस्वः॑। पति॑र्बभू॒थास॑मो॒ जना॑ना॒मेको॒ विश्व॑स्य॒ भुव॑नस्य॒ राजा॑ ॥४॥

सः । रा॒यः । खाम् । उप॑ । सृ॒ज॒ । गृ॒णा॒नः । पु॒रु॒ऽच॒न्द्रस्य॑ । त्वम् । इ॒न्द्र॒ । वस्वः॑ । पतिः॑ । ब॒भू॒थ॒ । अस॑मः । जना॑नाम् । एकः॑ । विश्व॑स्य । भुव॑नस्य । राजा॑ ॥

Mantra without Swara
स रायस्खामुप सृजा गृणानः पुरुश्चन्द्रस्य त्वमिन्द्र वस्वः। पतिर्बभूथासमो जनानामेको विश्वस्य भुवनस्य राजा ॥

सः। रायः। खाम्। उप। सृज। गृणानः। पुरुऽचन्द्रस्य। त्वम्। इन्द्र। वस्वः। पतिः। बभूथ। असमः। जनानाम्। एकः। विश्वस्य। भुवनस्य। राजा ॥४॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 8 Mantra » 4

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Meaning
हे (इन्द्र) धन के स्वामिन् राजन् ! जैसे (विश्वस्य) सम्पूर्ण (भुवनस्य) संसार का स्वामी (असमः) जिसके समान और नहीं (सः) वह (एकः) सहायरहित (राजा) प्रकाशमान राजा है, वैसे आप (जनानाम्) धार्मिक मनुष्यों और (पुरुश्चन्द्रस्य) बहुत सुवर्ण जिसमें उसके (रायः) लक्ष्मी के (वस्वः) धन के (पतिः) स्वामी (बभूथ) हूजिये और (गृणानः) स्तुति करते हुए (त्वम्) आप (खाम्) नदी के समान धन के कोश को (उपसृजा) बनाइये ॥४॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे राजा लोगो ! जैसे ईश्वर पक्षपात का त्याग करके सब का न्याय से पालन करनेवाला है, वैसे ही होकर आप लोग धन के स्वामी हूजिये ॥४॥
Subject
फिर राजा कैसा होवे, इस विषय को कहते हैं ॥

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