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Rigveda Mandal 6 / Sukta 36 / Mantra 3

75 Sukta
5 Mantra
6/36/3
Devata- इन्द्र: Rishi- नरः Chhanda- स्वराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
तं स॒ध्रीची॑रू॒तयो॒ वृष्ण्या॑नि॒ पौंस्या॑नि नि॒युतः॑ सश्चु॒रिन्द्र॑म्। स॒मु॒द्रं न सिन्ध॑व उ॒क्थशु॑ष्मा उरु॒व्यच॑सं॒ गिर॒ आ वि॑शन्ति ॥३॥

तम् । स॒ध्रीचीः॑ । ऊ॒तयः॑ । वृष्ण्या॑नि । पौंस्या॑नि । नि॒ऽयुतः॑ । सश्चुः॑ । इन्द्र॑म् । स॒मु॒द्रम् । न । सिन्ध॑वः । उ॒क्थऽशु॑ष्माः । उ॒रु॒ऽव्यच॑सम् । गिरः॑ । आ । वि॒श॒न्ति॒ ॥

Mantra without Swara
तं सध्रीचीरूतयो वृष्ण्यानि पौंस्यानि नियुतः सश्चुरिन्द्रम्। समुद्रं न सिन्धव उक्थशुष्मा उरुव्यचसं गिर आ विशन्ति ॥

तम्। सध्रीचीः। ऊतयः। वृष्ण्यानि। पौंस्यानि। निऽयुतः। सश्चुः। इन्द्रम्। समुद्रम्। न। सिन्धवः। उक्थऽशुष्माः। उरुऽव्यचसम्। गिरः। आ। विशन्ति ॥३॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 8 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वानो ! जिस (उरुव्यचसम्) बहुत श्रेष्ठ गुणों में व्यापक (इन्द्रम्) सत्य धर्म और न्याय के धारण करनेवाले को (उक्थशुष्माः) कहे बल जिनसे वे (गिरः) वाणियाँ (समुद्रम्) समुद्र को (सिन्धवः) नदियाँ (न) जैसे वैसे (आ, विशन्ति) सब प्रकार से प्राप्त होती हैं (तम्) उसको (सध्रीचीः) एक साथ गमन करनेवाली (नियुतः) वायु की निश्चित गतियों के समान क्रिया और (ऊतयः) रक्षण आदि क्रियायें (वृष्ण्यानि) दुष्टों के सामर्थ्य को रोकनेवाले (पौंस्यानि) वचन भी (सश्चुः) प्राप्त होवें ॥३॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे नीचे चलनेवाली नदियाँ समुद्र को सब ओर से प्राप्त होती हैं, वैसे ही धार्मिक राजा को सम्पूर्ण बल, सब रक्षायें और उत्तम प्रकार शिक्षित वाणियाँ भी प्राप्त होती हैं ॥३॥
Subject
फिर उस उत्तम मनुष्यों को क्या प्राप्त होता है, इस विषय को कहते हैं ॥