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Rigveda Mandal 6 / Sukta 36 / Mantra 2

75 Sukta
5 Mantra
6/36/2
Devata- इन्द्र: Rishi- नरः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अनु॒ प्र ये॑जे॒ जन॒ ओजो॑ अस्य स॒त्रा द॑धिरे॒ अनु॑ वी॒र्या॑य। स्यू॒म॒गृभे॒ दुध॒येऽर्व॑ते च॒ क्रतुं॑ वृञ्ज॒न्त्यपि॑ वृत्र॒हत्ये॑ ॥२॥

अनु॑ । प्र । ये॒जे॒ । जनः॑ । ओजः॑ । अ॒स्य॒ । स॒त्रा । द॒धि॒रे॒ । अनु॑ । वी॒र्या॑य । स्यू॒म॒ऽगृभे॑ । दुध॑ये । अर्व॑ते । च॒ । क्रतु॑म् । वृ॒ञ्ज॒न्ति॒ । अपि॑ । वृ॒त्र॒ऽहत्ये॑ ॥

Mantra without Swara
अनु प्र येजे जन ओजो अस्य सत्रा दधिरे अनु वीर्याय। स्यूमगृभे दुधयेऽर्वते च क्रतुं वृञ्जन्त्यपि वृत्रहत्ये ॥

अनु। प्र। येजे। जनः। ओजः। अस्य। सत्रा। दधिरे। अनु। वीर्याय। स्यूमऽगृभे। दुधये। अर्वते। च। क्रतुम्। वृञ्जन्ति। अपि। वृत्रऽहत्ये ॥२॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 8 Mantra » 2

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Meaning
हे राजन् ! जो (जनः) मनुष्य जैसे शूरवीर जन (अस्य) इस संसार के मध्य में (सत्रा) सत्य (ओजः) बल को (दधिरे) धारण करते हैं और (वृत्रहत्ये) सङ्ग्राम में (स्यूमगृभे) एक दूसरे को मिले हुए के ग्रहण करनेवाले (वीर्याय) पराक्रम के लिये (क्रतुम्) बुद्धि को (अनु) पीछे धारण करते हैं (च) और (दुधये) मारनेवाले (अर्वते) प्राप्त हुए के लिये बुद्धि का (अपि) भी (वृञ्जन्ति) त्याग करते हैं, वैसे (अनु, प्र, येजे) यज्ञ करता है, उसको और उनको आप ग्रहण करिये और हिंसकों को वर्जिये ॥२॥
Essence
जो मनुष्य न्याय और दया से युक्त बुद्धि को धारण कर, धर्म्मयुक्त कर्म्मों को कर, दुष्टता को दूर कर और युद्ध में विजय प्राप्त करके श्रेष्ठों की सङ्गति करते हैं, वे दिनरात्रि बुद्धि को बढ़ा सकते हैं ॥२॥
Subject
फिर मनुष्य कैसा वर्त्ताव करें, इस विषय को कहते हैं ॥

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