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Rigveda Mandal 6 / Sukta 35 / Mantra 4

75 Sukta
5 Mantra
6/35/4
Devata- इन्द्र: Rishi- नरः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
स गोम॑घा जरि॒त्रे अश्व॑श्चन्द्रा॒ वाज॑श्रवसो॒ अधि॑ धेहि॒ पृक्षः॑। पी॒पि॒हीषः॑ सु॒दुघा॑मिन्द्र धे॒नुं भ॒रद्वा॑जेषु सु॒रुचो॑ रुरुच्याः ॥४॥

सः । गोऽम॑घाः । ज॒रि॒त्रे । अश्व॑ऽचन्द्राः । वाज॑ऽश्रवसः । अधि॑ । धे॒हि॒ । पृक्षः॑ । पी॒पि॒हि । इषः॑ । सु॒ऽदुघा॑म् । इ॒न्द्र॒ । धे॒नुम् । भ॒रत्ऽवा॑जेषु । सु॒ऽरुचः॑ । रु॒रु॒च्याः॒ ॥

Mantra without Swara
स गोमघा जरित्रे अश्वश्चन्द्रा वाजश्रवसो अधि धेहि पृक्षः। पीपिहीषः सुदुघामिन्द्र धेनुं भरद्वाजेषु सुरुचो रुरुच्याः ॥

सः। गोऽमघाः। जरित्रे। अश्वऽचन्द्राः। वाजऽश्रवसः। अधि। धेहि। पृक्षः। पीपिहि। इषः। सुऽदुघाम्। इन्द्र। धेनुम्। भरत्ऽवाजेषु। सुऽरुचः। रुरुच्याः ॥४॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 7 Mantra » 4

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Meaning
हे (इन्द्र) विद्या और ऐश्वर्य्य के देनेवाले राजन् ! (सः) वह आप (जरित्रे) विद्या और गुण के प्रकाश करनेवाले के लिये जो (गोमघाः) पृथिवी के राज्यरूप धनवाले (अश्वश्चन्द्राः) घोड़े हैं सुवर्ण जिनके वे (वाजश्रवसः) अन्न और विद्याश्रवण युक्त (पृक्षः) सम्बन्ध करने योग्य हैं उनको हम लोगों में (अधि, धेहि) धारण करिये और (इषः) प्राप्त होने योग्य रसों को (पीपिहि) पीजिये और (भरद्वाजेषु) धारण किया विज्ञान जिन्होंने उन विद्वानों में (सुदुघाम्) उत्तम प्रकार कामना पूर्ण करनेवाली (धेनुम्) विद्या और शिक्षा से युक्त वाणी को (सुरुचः) तथा उत्तम प्रीतिवालों को (रुरुच्याः) प्रीतियुक्त करिये ॥४॥
Essence
हे राजन् ! अपनी प्रजाओं में पूर्ण विद्या और सम्पूर्ण धन को धारण कर और शरीर के आरोग्यपन को बढ़ा के धर्म्म में रुचि करिये ॥४॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

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