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Rigveda Mandal 6 / Sukta 34 / Mantra 5

75 Sukta
5 Mantra
6/34/5
Devata- इन्द्र: Rishi- शुनहोत्रः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अस्मा॑ ए॒तन्मह्यां॑ङ्गू॒षम॑स्मा॒ इन्द्रा॑य स्तो॒त्रं म॒तिभि॑रवाचि। अस॒द्यथा॑ मह॒ति वृ॑त्र॒तूर्य॒ इन्द्रो॑ वि॒श्वायु॑रवि॒ता वृ॒धश्च॑ ॥५॥

अस्मै॑ । ए॒तत् । महि॑ । आ॒ङ्गू॒षम् । अ॒स्मै॒ । इन्द्रा॑य । स्तो॒त्रम् । म॒तिऽभिः॑ । अ॒वा॒चि॒ । अस॑त् । यथा॑ । म॒ह॒ति । वृ॒त्र॒ऽतूर्ये॑ । इन्द्रः॑ । वि॒श्वऽआ॑युः । अ॒वि॒ता । वृ॒धः॒ । च॒ ॥

Mantra without Swara
अस्मा एतन्मह्यांङ्गूषमस्मा इन्द्राय स्तोत्रं मतिभिरवाचि। असद्यथा महति वृत्रतूर्य इन्द्रो विश्वायुरविता वृधश्च ॥

अस्मै। एतत्। महि। आङ्गूषम्। अस्मै। इन्द्राय। स्तोत्रम्। मतिऽभिः। अवाचि। असत्। यथा। महति। वृत्रऽतूर्ये। इन्द्रः। विश्वऽआयुः। अविता। वृधः। च ॥५॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 6 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! (यथा) जैसे (मतिभिः) विचारशील मनुष्यों से (अस्मै) इस उपदेशक के लिये (एतत्) यह (महि) बड़ा (आङ्गूषम्) प्राप्त होने योग्य (स्तोत्रम्) स्तोत्र (अवाचि) कहा जाता है और जैसे (अस्मै) इस (इन्द्राय) ऐश्वर्य्य के करनेवाले राजा के लिये यह बड़ा प्राप्त होने योग्य स्तोत्र कहा जाता है और जैसे (इन्द्रः) शत्रुओं का नाश करनेवाला योद्धा (महति) बड़े (वृत्रतूर्ये) सङ्ग्राम में (वृधः) बढ़ाने और (अविता) रक्षा करनेवाला (विश्वायुः च) और पूर्ण अवस्थायुक्त (असत्) होवे, वैसे आप लोगों को भी करना चाहिये ॥५॥
Essence
जो अविद्वान् हों, वे विद्वानों के अनुकरण से अपना वर्त्ताव उत्तम करें ॥५॥ इस सूक्त में इन्द्र, राजा और प्रजा के गुणवर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह चौंतीसवाँ सूक्त और छठा वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर विद्वानों को कैसा वर्त्ताव करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥