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Rigveda Mandal 6 / Sukta 34 / Mantra 4

75 Sukta
5 Mantra
6/34/4
Devata- इन्द्र: Rishi- शुनहोत्रः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अस्मा॑ ए॒तद्दि॒व्य१॒॑र्चेव॑ मा॒सा मि॑मि॒क्ष इन्द्रे॒ न्य॑यामि॒ सोमः॑। जनं॒ न धन्व॑न्न॒भि सं यदापः॑ स॒त्रा वा॑वृधु॒र्हव॑नानि य॒ज्ञैः ॥४॥

अस्मै॑ । ए॒तत् । दि॒वि । अ॒र्चाऽइ॑व । मा॒सा । मि॒मि॒क्षः । इन्द्रे॑ । नि । अ॒या॒मि॒ । सोमः॑ । जन॑म् । न । धन्व॑न् । अ॒भि । सम् । यत् । आपः॑ । स॒त्राः । व॒वृ॒धुः॒ । हव॑नानि । य॒ज्ञैः ॥

Mantra without Swara
अस्मा एतद्दिव्य१र्चेव मासा मिमिक्ष इन्द्रे न्ययामि सोमः। जनं न धन्वन्नभि सं यदापः सत्रा वावृधुर्हवनानि यज्ञैः ॥

अस्मै। एतत्। दिवि। अर्चाऽइव। मासा। मिमिक्षः। इन्द्रे। नि। अयामि। सोमः। जनम्। न। धन्वन्। अभि। सम्। यत्। आपः। सत्राः। ववृधुः। हवनानि। यज्ञैः ॥४॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 6 Mantra » 4

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Meaning
हे विद्वन् ! जिस (दिवि) सुन्दर शुद्ध व्यवहार में (इन्द्रे) दुष्टों के नाश करनेवाले राजा के होने पर (मासा) चैत्र आदि महीने (वावृधुः) बढ़ते हैं और (यज्ञैः) विद्वानों के सत्कारों से (अर्चेव) सत्क्रिया के समान (सत्रा) सत्य कारण से (यत्) जो (हवनानि) दान आदि कर्म्म बढ़ते हैं तथा (धन्वन्) बालुका से युक्त स्थान में (आपः) जल (जनम्) मनुष्य को (न) जैसे वैसे (सम्, अभि) उत्तम प्रकार चारों ओर से बढ़ते हैं (एतत्) यह (अस्मै) इसके लिये (सोमः) उत्पन्न करनेवाला मैं जैसे (नि, अयामि) निरन्तर प्राप्त होता हूँ, वैसे आप इसको (मिमिक्षः) सींचिये ॥४॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जैसे सत्कार करने योग्य का सत्कार और निर्जल स्थान में हुए को जल का मिलना सुखकारक होता है, वैसे ही यज्ञ का अनुष्ठान और श्रेष्ठ ऐश्वर्य्य सब के आनन्दकारक होते हैं ॥४॥
Subject
फिर वह राजा क्या करे, इस विषय को कहते हैं ॥

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