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Rigveda Mandal 6 / Sukta 34 / Mantra 3

75 Sukta
5 Mantra
6/34/3
Devata- इन्द्र: Rishi- शुनहोत्रः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
न यं हिंस॑न्ति धी॒तयो॒ न वाणी॒रिन्द्रं॒ नक्ष॒न्तीद॒भि व॒र्धय॑न्तीः। यदि॑ स्तो॒तारः॑ श॒तं यत्स॒हस्रं॑ गृ॒णन्ति॒ गिर्व॑णसं॒ शं तद॑स्मै ॥३॥

न । यम् । हिंस॑न्ति । धी॒तयः॑ । न । वाणीः॑ । इन्द्र॑म् । नक्ष॑न्ति । इत् । अ॒भि । व॒र्धय॑न्तीः । यदि॑ । स्तो॒तारः॑ । श॒तम् । यत् । स॒हस्र॑म् । गृ॒णन्ति॑ । गिर्व॑णसम् । शम् । तत् । अ॒स्मै॒ ॥

Mantra without Swara
न यं हिंसन्ति धीतयो न वाणीरिन्द्रं नक्षन्तीदभि वर्धयन्तीः। यदि स्तोतारः शतं यत्सहस्रं गृणन्ति गिर्वणसं शं तदस्मै ॥

न। यम्। हिंसन्ति। धीतयः। न। वाणीः। इन्द्रम्। नक्षन्ति। इत्। अभि। वर्धयन्तीः। यदि। स्तोतारः। शतम्। यत्। सहस्रम्। गृणन्ति। गिर्वणसम्। शम्। तत्। अस्मै ॥३॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 6 Mantra » 3

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Meaning
हे विद्वानो ! (यम्) जिस (इन्द्रम्) पूर्ण विद्यावाले और अत्यन्त ऐश्वर्य्यवाले राजा को (इत्) ही (धीतयः) अङ्गुलियाँ (न) नहीं (हिंसन्ति) नष्ट करती हैं और जिस पूर्णविद्या और अत्यन्त ऐश्वर्य्यवाले राजा को (वाणीः) वाणियाँ (न) नहीं नष्ट करती हैं और जिस पूर्ण विद्यावाले और अत्यन्त ऐश्वर्य्ययुक्त राजा को (वर्धयन्तीः) बढ़ाती हुई अङ्गुलियाँ और वाणियाँ (अभि, नक्षन्ति) प्राप्त होती हैं और (यदि) जो उस (गिर्वणसम्) वाणियों से सेवा करने और माँगनेवाले पूर्ण विद्या और अत्यन्त ऐश्वर्य्ययुक्त राजा की (स्तोतारः) स्तुति करनेवाले जन (गृणन्ति) स्तुति करते हैं तो (यत्) जो (अस्मै) इस स्तुति करनेवाले के लिये (शतम्) सैकड़ों और (सहस्रम्) असंख्य प्रकार का (शम्) सुख प्राप्त होता है (तत्) वह हम लोगों को भी प्राप्त हो ॥३॥
Essence
हे मनुष्यो ! जिसको शत्रु से की हुई विरुद्ध क्रियायें और निन्दित वाणियाँ नहीं पीड़ित करती हैं, उस हर्ष और शोक से सहित राजा को अतुल सुख प्राप्त होता है ॥३॥
Subject
फिर वह राजा कैसा होता है, इस विषय को कहते हैं ॥

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