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Rigveda Mandal 6 / Sukta 34 / Mantra 2

75 Sukta
5 Mantra
6/34/2
Devata- इन्द्र: Rishi- शुनहोत्रः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
पु॒रु॒हू॒तो यः पु॑रुगू॒र्त ऋभ्वाँ॒ एकः॑ पुरुप्रश॒स्तो अस्ति॑ य॒ज्ञैः। रथो॒ न म॒हे शव॑से युजा॒नो॒३॒॑स्माभि॒रिन्द्रो॑ अनु॒माद्यो॑ भूत् ॥२॥

पु॒रु॒ऽहू॒तः । यः । पु॒रु॒ऽगू॒र्तः । ऋभ्वा॑ । एकः॑ । पु॒रु॒ऽप्र॒श॒स्तः । अस्ति॑ । य॒ज्ञैः । रथः॑ । न । म॒हे । शव॑से । यु॒जा॒नः । अ॒स्माभिः॑ । इन्द्रः॑ । अ॒नु॒ऽमाद्यः॑ । भू॒त् ॥

Mantra without Swara
पुरुहूतो यः पुरुगूर्त ऋभ्वाँ एकः पुरुप्रशस्तो अस्ति यज्ञैः। रथो न महे शवसे युजानो३स्माभिरिन्द्रो अनुमाद्यो भूत् ॥

पुरुऽहूतः। यः। पुरुऽगूर्तः। ऋभ्वा। एकः। पुरुऽप्रशस्तः। अस्ति। यज्ञैः। रथः। न। महे। शवसे। युजानः। अस्माभिः। इन्द्रः। अनुऽमाद्यः। भूत् ॥२॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 6 Mantra » 2

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Meaning
हे विद्वज्जनो ! (यः) जो (पुरुहूतः) बहुतों से सत्कार किया गया (पुरुगूर्त्तः) बहुतों से उत्तम कराया गया (पुरुप्रशस्तः) बहुतों में उत्तम (एकः) सहायरहित (रथः) विमान आदि वाहन (न) जैसे वैसे (महे) बड़े (शवसे) बल के लिये (यज्ञैः) विद्वानों के सत्कार और सङ्ग तथा दोनों से और (ऋभ्वा) बड़े बुद्धिमान् से (युजानः) युक्त हुआ (इन्द्रः) अत्यन्त ऐश्वर्य्य का देनेवाला (अस्माभिः) हम लोगों के साथ (अनुमाद्यः) पीछे से प्रसन्न होने योग्य (भूत्) होवे, वह हम लोगों का आनन्दकारक (अस्ति) है, उस राजा को आप लोग भी मानिये ॥२॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जैसे घोड़ों और अग्नि आदिकों से युक्त रथ अभीष्ट कार्य्यों को करता है, वैसे ही उत्तम सहायों के सहित राजा राज्य के कार्य्यों को पूर्ण करने को समर्थ होता है ॥२॥
Subject
फिर वह राजा कैसा होवे, इस विषय को कहते हैं ॥

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