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Rigveda Mandal 6 / Sukta 34 / Mantra 1

75 Sukta
5 Mantra
6/34/1
Devata- इन्द्र: Rishi- शुनहोत्रः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
सं च॒ त्वे ज॒ग्मुर्गिर॑ इन्द्र पू॒र्वीर्वि च॒ त्वद्य॑न्ति वि॒भ्वो॑ मनी॒षाः। पु॒रा नू॒नं च॑ स्तु॒तय॒ ऋषी॑णां पस्पृ॒ध्र इन्द्रे॒ अध्यु॑क्था॒र्का ॥१॥

सम् । च॒ । त्वे इति॑ । ज॒ग्मुः । गिरः॑ । इ॒न्द्र॒ । पू॒र्वीः । वि । च॒ । त्वत् । य॒न्ति॒ । वि॒ऽभ्वः॑ । म॒नी॒षाः । पु॒रा । नू॒नम् । च॒ । स्तु॒तयः॑ । ऋषी॑णाम् । प॒स्पृ॒ध्रे । इन्द्रे॑ । अधि॑ । उ॒क्थ॒ऽअ॒र्का ॥

Mantra without Swara
सं च त्वे जग्मुर्गिर इन्द्र पूर्वीर्वि च त्वद्यन्ति विभ्वो मनीषाः। पुरा नूनं च स्तुतय ऋषीणां पस्पृध्र इन्द्रे अध्युक्थार्का ॥

सम्। च। त्वे इति। जग्मुः। गिरः। इन्द्र। पूर्वीः। वि। च। त्वत्। यन्ति। विऽभ्वः। मनीषाः। पुरा। नूनम्। च। स्तुतयः। ऋषीणाम्। पस्पृध्रे। इन्द्रे। अधि। उक्थऽअर्का ॥१॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 6 Mantra » 1

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Meaning
हे (इन्द्र) विद्या के देनेवाले जो (त्वे) कोई (त्वत्) आपके समीप से (पूर्वीः) प्राचीन (गिरः) उत्तम प्रकार शिक्षित वाणियों को (च) भी (यन्ति) प्राप्त होते हैं (च) और श्रेष्ठ गुणों से (सम्) उत्तम प्रकार (जग्मुः) मिलते हैं तथा (विभ्वः) श्रेष्ठ गुणों से व्याप्त (मनीषाः) गमन करनेवाले हुए परस्पर (वि) विशेष करके प्राप्त होते हैं और (ऋषीणाम्) वेद के मन्त्रों के अर्थ जाननेवालों और यथार्थ उपदेश करनेवालों के (पुरा) आगे (स्तुतयः, च) प्रशंसाओं की भी (नूनम्) निश्चय से (पस्पृध्रे) स्पर्द्धा करते हैं और (इन्द्रे) अत्यन्त ऐश्वर्य्य देनेवाले के लिये (उक्थार्का) प्रशंसित और आदर करने योग्य वचनों की (अधि) अधिक स्पर्धा करते हैं, वे सुख को प्राप्त होते हैं ॥१॥
Essence
हे राजन् ! इस संसार में कोई योग्य, कोई अयोग्य जन होते हैं, उन में प्रशंसा करने योग्य सज्जनों के साथ मेल करके उत्तम सहायवाले हुए धर्म्म से राज्यपालन निरन्तर करिये ॥१॥
Subject
अब पाँच ऋचावाले चौंतीसवें सूक्त का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में राजा क्या करे, इस विषय को कहते हैं ॥

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