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Rigveda Mandal 6 / Sukta 33 / Mantra 4

75 Sukta
5 Mantra
6/33/4
Devata- इन्द्र: Rishi- शुनहोत्रः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
स त्वं न॑ इ॒न्द्राक॑वाभिरू॒ती सखा॑ वि॒श्वायु॑रवि॒ता वृ॒धे भूः॑। स्व॑र्षाता॒ यद्ध्वया॑मसि त्वा॒ युध्य॑न्तो ने॒मधि॑ता पृ॒त्सु शू॑र ॥४॥

सः । त्वम् । नः॒ । इ॒न्द्र॒ । अक॑वाभिः । ऊ॒ती । सखा॑ । वि॒श्वऽआ॑युः । अ॒वि॒ता । वृ॒धे । भूः॒ । स्वः॑ऽसाता । यत् । ह्वया॑मसि । त्वा॒ । युध्य॑न्तः । ने॒मऽधि॑ता । पृ॒त्ऽसु । शू॒र॒ ॥

Mantra without Swara
स त्वं न इन्द्राकवाभिरूती सखा विश्वायुरविता वृधे भूः। स्वर्षाता यद्ध्वयामसि त्वा युध्यन्तो नेमधिता पृत्सु शूर ॥

सः। त्वम्। नः। इन्द्र। अकवाभिः। ऊती। सखा। विश्वऽआयुः। अविता। वृधे। भूः। स्वःऽसाता। यत्। ह्वयामसि। त्वा। युध्यन्तः। नेमऽधिता। पृत्ऽसु। शूर ॥४॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 5 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (शूर) शूरवीर शत्रुजनों के नाश करने और (इन्द्र) सुख के देनेवाले ! (यत्) जो (त्वम्) आप (अकवाभिः) नहीं निन्दा करनेवालों और (ऊती) रक्षाओं से (नः) हमारे (सखा) मित्र (विश्वायुः) सम्पूर्ण अवस्था से युक्त (अविता) रक्षक (वृधे) वृद्धि के लिये (भूः) होवें (सः) वह आप (स्वर्षाता) सुख के देनेवाले हुए जीतनेवाले हूजिये उन (त्वा) आपको (नेमधिता) धार्मिक और अधार्मिक के मध्य में धार्मिकों के ग्रहण करनेवाले (पृत्सु) सङ्ग्रामों वा सेनाओं से (युध्यन्तः) युद्ध करते हुए हम लोग (ह्वयामसि) पुकारें ॥४॥
Essence
हे राजन् ! जैसे मित्र मित्रके लिये प्रिय आचरण करता है, वैसे ही प्रजा के लिये हित धारण करिये और जहाँ-जहाँ प्रजायें पुकारें, वहाँ-वहाँ उपस्थित हूजिये और शत्रुओं के जीतने में प्रयत्न करिये ॥४॥
Subject
फिर वह राजा कैसा हो, इस विषय को कहते हैं ॥