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Rigveda Mandal 6 / Sukta 33 / Mantra 2

75 Sukta
5 Mantra
6/33/2
Devata- इन्द्र: Rishi- शुनहोत्रः Chhanda- निचृत्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
त्वां ही॒३॒॑न्द्राव॑से॒ विवा॑चो॒ हव॑न्ते चर्ष॒णयः॒ शूर॑सातौ। त्वं विप्रे॑भि॒र्वि प॒णीँर॑शाय॒स्त्वोत॒ इत्सनि॑ता॒ वाज॒मर्वा॑ ॥२॥

त्वाम् । हि । इ॒न्द्र॒ । अव॑से । विवा॑चः । हव॑न्ते । च॒र्ष॒णयः॑ । शूर॑ऽसातौ । त्वम् । विप्रे॑भिः । वि । प॒णीन् । अ॒शा॒यः॒ । त्वाऽऊ॑तः । इत् । सनि॑ता । वाज॑म् । अर्वा॑ ॥

Mantra without Swara
त्वां ही३न्द्रावसे विवाचो हवन्ते चर्षणयः शूरसातौ। त्वं विप्रेभिर्वि पणीँरशायस्त्वोत इत्सनिता वाजमर्वा ॥

त्वाम्। हि। इन्द्र। अवसे। विवाचः। हवन्ते। चर्षणयः। शूरऽसातौ। त्वम्। विप्रेभिः। वि। पणीन्। अशायः। त्वाऽऊतः। इत्। सनिता। वाजम्। अर्वा ॥२॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 5 Mantra » 2

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Meaning
हे (इन्द्र) दुःख के नाश करनेवाले राजन् ! जो (हि) जिससे (अर्वा) घोड़े के समान श्रेष्ठ गुणों के ग्रहण करनेवाले वेगवाले (सनिता) विभाग करनेवाले (त्वोतः) आप से रक्षित जन (वाजम्) विज्ञान को प्राप्त होता है, उसके सहित (त्वम्) आप (विप्रेभिः) मेधावी जनों के साथ (पणीन्) प्रशंसितों को (वि, अशायः) सुलाइये उस (इत्) ही (त्वाम्) आपकी (अवसे) रक्षा आदि के लिये (शूरसातौ) शूरवीर जनों के विभागरूप सङ्ग्राम में (विवाचः) अनेक प्रकार की विद्या से युक्त वाणियोंवाले (चर्षणयः) विद्वान् जन (हवन्ते) स्तुति करते हैं ॥२॥
Essence
जो राजा धार्मिक विद्वानों के साथ राज्य का पालन करे तो उसकी कौन नहीं प्रशंसा करे ॥२॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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