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Rigveda Mandal 6 / Sukta 33 / Mantra 1

75 Sukta
5 Mantra
6/33/1
Devata- इन्द्र: Rishi- शुनहोत्रः Chhanda- निचृत्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
य ओजि॑ष्ठ इन्द्र॒ तं सु नो॑ दा॒ मदो॑ वृषन्त्स्वभि॒ष्टिर्दास्वा॑न्। सौव॑श्व्यं॒ यो व॒नव॒त्स्वश्वो॑ वृ॒त्रा स॒मत्सु॑ सा॒सह॑द॒मित्रा॑न् ॥१॥

यः । ओजि॑ष्ठः । इ॒न्द्र॒ । तम् । सु । नः॒ । दाः॒ । मदः॑ । वृ॒ष॒न् । सु॒ऽअ॒भि॒ष्टिः । दास्वा॑न् । सौव॑श्व्यम् । यः । व॒नऽव॑त् । सु॒ऽअश्वः॑ । वृ॒त्रा । स॒मत्ऽसु॑ । स॒सह॑त् । अ॒मित्रा॑न् ॥

Mantra without Swara
य ओजिष्ठ इन्द्र तं सु नो दा मदो वृषन्त्स्वभिष्टिर्दास्वान्। सौवश्व्यं यो वनवत्स्वश्वो वृत्रा समत्सु सासहदमित्रान् ॥

यः। ओजिष्ठः। इन्द्र। तम्। सु। नः। दाः। मदः। वृषन्। सुऽअभिष्टिः। दास्वान्। सौवश्व्यम्। यः। वनऽवत्। सुऽअश्वः। वृत्रा। समत्ऽसु। ससहत्। अमित्रान् ॥१॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 5 Mantra » 1

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Meaning
हे (वृषन्) तेजस्वी (इन्द्र) ऐश्वर्य्य के देनेवाले (यः) जो (ओजिष्ठः) अतिशय बली (मदः) हर्षित हुए (स्वभिष्टिः) अच्छी सङ्गतिवाले (दास्वान्) दाता वह आप (नः) हम लोगों के लिये (सौवश्व्यम्) सुन्दर घोड़ों और बड़े पदार्थों में हुए को (सु) उत्तम प्रकार (दाः) दीजिये और (यः) जो (स्वश्वः) अच्छे घोड़ोंवाला हुआ (वृत्रा) धनों की (वनवत्) याचना करता है तथा (समत्सु) संग्रामों में (अमित्रान्) शत्रुओं को (सासहत्) अत्यन्त सहता है (तम्) उसका हम लोग सत्कार करें ॥१॥
Essence
जो अभय देनेवाला और सङ्ग्रामों में जीतनेवाला तथा दिन-रात अपने बल को बढ़ाता है, वही सब को सुखी करने को योग्य है ॥१॥
Subject
अब पाँच ऋचावाले तेंतीसवें सूक्त का प्रारम्भ किया जाता है उसके प्रथम मन्त्र में राजा क्या करके क्या करावे, इस विषय को कहते हैं ॥

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