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Rigveda Mandal 6 / Sukta 32 / Mantra 3

75 Sukta
5 Mantra
6/32/3
Devata- इन्द्र: Rishi- सुहोत्रः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
स वह्नि॑भि॒र्ऋक्व॑भि॒र्गोषु॒ शश्व॑न्मि॒तज्ञु॑भिः पुरु॒कृत्वा॑ जिगाय। पुरः॑ पुरो॒हा सखि॑भिः सखी॒यन्दृ॒ळ्हा रु॑रोज क॒विभिः॑ क॒विः सन् ॥३॥

सः । वह्नि॑ऽभिः । ऋक्व॑ऽभिः । गोषु॑ । शश्व॑त् । मि॒तज्ञु॑ऽभिः । पु॒रु॒ऽकृत्वा॑ । जि॒गा॒य॒ । पुरः॑ । पु॒रः॒ऽहा । सखि॑ऽभिः । स॒खि॒ऽयन् । दृ॒ळ्हा । रु॒रो॒ज॒ । क॒विऽभिः॑ । क॒विः । सन् ॥

Mantra without Swara
स वह्निभिर्ऋक्वभिर्गोषु शश्वन्मितज्ञुभिः पुरुकृत्वा जिगाय। पुरः पुरोहा सखिभिः सखीयन्दृळ्हा रुरोज कविभिः कविः सन् ॥

सः। वह्निऽभिः। ऋक्वऽभिः। गोषु। शश्वत्। मितज्ञुऽभिः। पुरुऽकृत्वा। जिगाय। पुरः। पुरःऽहा। सखिऽभिः। सखिऽयन्। दृळ्हा। रुरोज। कविऽभिः। कविः। सन् ॥३॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 4 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे सज्जनो ! जो (मितज्ञुभिः) सङ्कुचित जाँघवाले बैठे हुए विद्वानों और (ऋक्वभिः) प्रशंसित (वह्निभिः) धारण करनेवाले (कविभिः) विद्वानों से (कविः) विद्वान् (सन्) हुआ और (सखिभिः) मित्रों से (सखीयन्) मित्र के सदृश आचरण करता हुआ (पुरोहा) नगरों का नाश करनेवाला (दृळ्हाः) कम्पन क्रिया से रहित (पुरः) शत्रुओं के नगरों का (रुरोज) भङ्ग करता है और (गोषु) उत्तम प्रकार शिक्षित वाणियों में (शश्वत्) निरन्तर (पुरुकृत्वा) बहुत करके शत्रुओं को (जिगाय) जीतता है (सः) वही आप लोगों से मानने योग्य है ॥३॥
Essence
जो मनुष्य प्रशंसित, बलिष्ठ, थोड़े बोलनेवाले, विद्वान् मित्रों के साथ मित्रता कर राज्य को प्राप्त होकर दुष्टों का नाश करके धार्मिकों की रक्षा करते हैं, वे कृतकृत्य होते हैं ॥३॥
Subject
राजा कैसे जनों के साथ मित्रता करे, इस विषय को कहते हैं ॥