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Rigveda Mandal 6 / Sukta 32 / Mantra 2

75 Sukta
5 Mantra
6/32/2
Devata- इन्द्र: Rishi- सुहोत्रः Chhanda- स्वराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
स मा॒तरा॒ सूर्ये॑णा कवी॒नामवा॑सयद्रु॒जदद्रिं॑ गृणा॒नः। स्वा॒धीभि॒र्ऋक्व॑भिर्वावशा॒न उदु॒स्रिया॑णामसृजन्नि॒दान॑म् ॥२॥

सः । मा॒तरा॑ । सूर्ये॑ण । क॒वी॒नाम् । अवा॑सयत् । रु॒जत् । अद्रि॑म् । गृ॒णा॒नः । सु॒ऽआ॒धीभिः॑ । ऋक्व॑ऽभिः । वा॒व॒शा॒नः । उत् । उ॒स्रिया॑णाम् । अ॒सृ॒ज॒त् । नि॒ऽदान॑म् ॥

Mantra without Swara
स मातरा सूर्येणा कवीनामवासयद्रुजदद्रिं गृणानः। स्वाधीभिर्ऋक्वभिर्वावशान उदुस्रियाणामसृजन्निदानम् ॥

सः। मातरा। सूर्येण। कवीनाम्। अवासयत्। रुजत्। अद्रिम्। गृणानः। सुऽआधीभिः। ऋक्वऽभिः। वावशानः। उत्। उस्रियाणाम्। असृजत्। निऽदानम् ॥२॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 4 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जैसे (सूर्येण) सूर्य्य के सहित बिजुलीरूप अग्नि (अद्रिम्) मेघ को (रुजत्) स्थिर करता और (कवीनाम्) विद्वानों के (मातरा) माता-पिता को (अवासयत्) वसाता है, वैसे ही जो राजा (स्वाधीभिः) सुन्दर स्थान जिनके उन नीतियों और (ऋक्वभिः) प्रशंसा के योग्य व्यवहारों के साथ (गृणानः) स्तुति करता और (वावशानः) कामना करता हुआ जैसे सूर्य्य (उस्रियाणाम्) किरणों के (निदानम्) निश्चय को, वैसे निश्चय को (उत्, असृजत्) उत्पन्न करता है (स) वह राजा सब से सत्कार करने योग्य है ॥२॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे राजन् ! जैसे सूर्य्य किरणों से सबको प्रकाशित करता है, वैसे ही विनय आदिकों से सम्पूर्ण राज्य को प्रकाशित करिये और जैसे श्रेष्ठ पुत्र माता-पिता की सेवा करते हैं, वैसे ही राजधर्म का सेवन करिये ॥२॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥