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Rigveda Mandal 6 / Sukta 32 / Mantra 1

75 Sukta
5 Mantra
6/32/1
Devata- इन्द्र: Rishi- सुहोत्रः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
अपू॑र्व्या पुरु॒तमा॑न्यस्मै म॒हे वी॒राय॑ त॒वसे॑ तु॒राय॑। वि॒र॒प्शिने॑ व॒ज्रिणे॒ शंत॑मानि॒ वचां॑स्या॒सा स्थवि॑राय तक्षम् ॥१॥

अपू॑र्व्या । पु॒रु॒ऽतमा॑नि । अ॒स्मै॒ । म॒हे । वी॒राय॑ । त॒वसे॑ । तु॒राय॑ । वि॒र॒प्शिने॑ । व॒ज्रिणे॑ । शम्ऽत॑मानि । वचां॑सि । आ॒सा । स्थवि॑राय । त॒क्ष॒म् ॥

Mantra without Swara
अपूर्व्या पुरुतमान्यस्मै महे वीराय तवसे तुराय। विरप्शिने वज्रिणे शंतमानि वचांस्यासा स्थविराय तक्षम् ॥

अपूर्व्या। पुरुऽतमानि। अस्मै। महे। वीराय। तवसे। तुराय। विरप्शिने। वज्रिणे। शम्ऽतमानि। वचांसि। आसा। स्थविराय। तक्षम् ॥१॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 4 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जैसे मैं (आसा) मुख से (अस्मै) इस (महे) बड़े (वीराय) बल पराक्रम तथा विद्यायुक्त के लिये और (तवसे) बल के लिये (तुराय) शीघ्र कार्य करनेवाले तथा (विरप्शिने) प्रशंसित (वज्रिणे) प्रशंसित शस्त्र और अस्त्रों से युक्त (स्थविराय) वृद्धजन के लिये (अपूर्व्या) नहीं विद्यमान हैं पूर्व जिससे उसमें हुए (पुरुतमानि) अतिशय बहुत (शन्तमानि) अतीव कल्याण करनेवाले (वचांसि) वचनों का (तक्षम्) उपदेश करूँ, वैसे आप लोग भी अन्यों को उपदेश दीजिये ॥१॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। विद्वानों को चाहिये कि सदा ही सब के लिये सत्य उपदेश करना चाहिये, जिससे अतुल सुख होवे ॥१॥
Subject
अब पाँच ऋचावाले बत्तीसवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में विद्वान् जन क्या करें, इस विषय को कहते हैं ॥