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Rigveda Mandal 6 / Sukta 31 / Mantra 4

75 Sukta
5 Mantra
6/31/4
Devata- इन्द्र: Rishi- सुहोत्रः Chhanda- निचृदतिशक्वरी Swara- निषादः
Mantra with Swara
त्वं श॒तान्यव॒ शम्ब॑रस्य॒ पुरो॑ जघन्थाप्र॒तीनि॒ दस्योः॑। अशि॑क्षो॒ यत्र॒ शच्या॑ शचीवो॒ दिवो॑दासाय सुन्व॒ते सु॑तक्रे भ॒रद्वा॑जाय गृण॒ते वसू॑नि ॥४॥

त्वम् । श॒तानि॑ । अव॑ । शम्ब॑रस्य । पुरः॑ । ज॒घ॒न्थ॒ । अ॒प्र॒तीनि॑ । दस्योः॑ । अशि॑क्षः । यत्र॑ । शच्या॑ । श॒ची॒ऽवः॒ । दिवः॑ऽदासाय । सु॒न्व॒ते । सु॒त॒ऽक्रे॒ । भ॒रत्ऽवा॑जाय । गृ॒ण॒ते । वसू॑नि ॥

Mantra without Swara
त्वं शतान्यव शम्बरस्य पुरो जघन्थाप्रतीनि दस्योः। अशिक्षो यत्र शच्या शचीवो दिवोदासाय सुन्वते सुतक्रे भरद्वाजाय गृणते वसूनि ॥

त्वम्। शतानि। अव। शम्बरस्य। पुरः। जघन्थ। अप्रतीनि। दस्योः। अशिक्षः। यत्र। शच्या। शचीऽवः। दिवःऽदासाय। सुन्वते। सुतऽक्रे। भरत्ऽवाजाय। गृणते। वसूनि ॥४॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 3 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (शचीवः) उत्तम बुद्धिवाले (सुतक्रे) उत्तम प्रकार प्रसन्न अत्यन्त ऐश्वर्य के देनेवाले राजन् ! (त्वम्) आप जैसे सूर्य्य (शम्बरस्य) मेघ के समान शत्रु के (शतानि) सैकड़ों (पुरः) नगरों का (अव, जघन्थ) नाश करते हो, वैसे (दस्योः) दूसरे के द्रव्य चुरानेवाले दुष्टजन के (अप्रतीनि) नहीं जाने गये भी सैकड़ों नगरों का नाश करिये और (शच्या) उत्तमशिक्षायुक्त वाणी वा उत्तम कर्म्म से इनको (अशिक्षः) शिक्षा दीजिये और (यत्र) जहाँ (दिवोदासाय) विज्ञान के देने तथा (सुन्वते) सार के निकालनेवाले (गृणते) स्तुति करते हुए (भरद्वाजाय) विज्ञान के धारण करनेवाले के लिये (वसूनि) द्रव्यों को दीजिये, वहाँ इससे विद्या का प्रचार कराइये ॥४॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो राजा सूर्य्य के सदृश न्याय का प्रकाश करनेवाला और मेघ के सदृश विद्या आदि के प्रचार के लिये बहुत धन का देनेवाला होता है, वही सर्वत्र विजय को प्राप्त होता है ॥४॥
Subject
फिर राजा क्या करे, इस विषय को कहते हैं ॥