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Rigveda Mandal 6 / Sukta 31 / Mantra 3

75 Sukta
5 Mantra
6/31/3
Devata- इन्द्र: Rishi- सुहोत्रः Chhanda- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
त्वं कुत्से॑ना॒भि शुष्ण॑मिन्द्रा॒शुषं॑ युध्य॒ कुय॑वं॒ गवि॑ष्टौ। दश॑ प्रपि॒त्वे अध॒ सूर्य॑स्य मुषा॒यश्च॒क्रमवि॑वे॒ रपां॑सि ॥३॥

त्वम् । कुत्से॑न । अ॒भि । शुष्ण॑म् । इ॒न्द्र॒ । अ॒शुष॑म् । यु॒ध्य॒ । कुय॑वम् । गवि॑ष्टौ । दश॑ । प्र॒ऽपि॒त्वे । अध॑ । सूर्य॑स्य । मु॒षा॒यः । च॒क्रम् । अवि॑वेः । रपां॑सि ॥

Mantra without Swara
त्वं कुत्सेनाभि शुष्णमिन्द्राशुषं युध्य कुयवं गविष्टौ। दश प्रपित्वे अध सूर्यस्य मुषायश्चक्रमविवे रपांसि ॥

त्वम्। कुत्सेन। अभि। शुष्णम्। इन्द्र। अशुषम्। युध्य। कुयवम्। गविष्टौ। दश। प्रऽपित्वे। अध। सूर्यस्य। मुषायः। चक्रम्। अविवेः। रपांसि ॥३॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 3 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) अत्यन्त ऐश्वर्य्य के देनेवाले राजन् ! (त्वम्) आप (शुष्णम्) बल और (अशुषम्) शुष्करहित को (कुत्सेन) वज्र से (गविष्टौ) किरणों के समागम में (कुयवम्) कुत्सित यव जिसमें उसको (अभि, युध्य) अभियोधन करो (अध) इसके अनन्तर (प्रपित्वे) प्राप्ति में (दश) दश (रपांसि) हिंसनों को (मुषायः) चुराओ और (सूर्यस्य) सूर्य्य के (चक्रम्) चक्र को (अविवेः) व्याप्त होओ ॥३॥
Essence
हे राजन् ! आप अधर्मी शत्रु के साथ ही युद्ध करिये, धर्मात्मा के साथ न करिये, ऐसा करने पर जिस प्रकार सूर्य्य के चारों ओर भूगोल चक्र के समान घूमते हैं, वैसे ही प्रजाजन आपको देखकर पुरुषार्थ से चलेंगे ॥३॥
Subject
फिर राजा क्या करे, इस विषय को कहते हैं ॥