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Rigveda Mandal 6 / Sukta 31 / Mantra 1

75 Sukta
5 Mantra
6/31/1
Devata- इन्द्र: Rishi- सुहोत्रः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अभू॒रेको॑ रयिपते रयी॒णामा हस्त॑योरधिथा इन्द्र कृ॒ष्टीः। वि तो॒के अ॒प्सु तन॑ये च॒ सूरेऽवो॑चन्त चर्ष॒णयो॒ विवा॑चः ॥१॥

अभूः॑ । एकः॑ । र॒यि॒ऽप॒ते॒ । र॒यी॒णाम् । आ । हस्त॑योः । अ॒धि॒थाः॒ । इ॒न्द्र॒ । कृ॒ष्टीः । वि । तो॒के । अ॒प्ऽसु । तन॑ये । च॒ । सूरे॑ । अवो॑चन्त । च॒र्ष॒णयः॑ । विवा॑चः ॥

Mantra without Swara
अभूरेको रयिपते रयीणामा हस्तयोरधिथा इन्द्र कृष्टीः। वि तोके अप्सु तनये च सूरेऽवोचन्त चर्षणयो विवाचः ॥

अभूः। एकः। रयिऽपते। रयीणाम्। आ। हस्तयोः। अधिथाः। इन्द्र। कृष्टीः। वि। तोके। अप्ऽसु। तनये। च। सूरे। अवोचन्त। चर्षणयः। विवाचः ॥१॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 3 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (रयीणाम्) द्रव्यों के बीच (रयिपते) धन के स्वामिन् (इन्द्र) ऐश्वर्य्य के देनेवाले राजन् ! आप जो (विवाचः) अनेक प्रकार की विद्या और शिक्षा से युक्त वाणियोंवाले (चर्षणयः) मनुष्य (अप्सु) प्राणों वा अन्तरिक्ष तथा (तोके) शीघ्र उत्पन्न हुए सन्तान (तनये, च) और ब्रह्मचारी कुमार और (सूरे) सूर्य्य में विद्याओं को (वि, अवोचन्त) विशेष कहते हैं उन (कृष्टीः) मनुष्य आदि प्रजाओं को (हस्तयोः) हाथों में आंवले के सदृश (आ, अधिथाः) अच्छे प्रकार धारण करिये और (एकः) सहायरहित हुए प्रजा के पालन करनेवाले (अभूः) हूजिये ॥१॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। परमेश्वर का स्वभाव है कि जो सत्य का उपदेश देते हैं, उनको सदा उत्साहित करता और रक्षा में धारण करता और ऐश्वर्य्य को प्राप्त कराता है और जैसे विनय से युक्त एक भी राजा राज्यपालन करने को समर्थ होता है, वैसे ही सर्वशक्तिमान् परमात्मा सम्पूर्ण सृष्टि की सदा रक्षा करता है ॥१॥
Subject
अब पाँच ऋचावाले इकतीसवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में ईश्वर कैसा है, इस विषय को कहते हैं ॥