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Rigveda Mandal 6 / Sukta 30 / Mantra 5

75 Sukta
5 Mantra
6/30/5
Devata- इन्द्र: Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- ब्राह्म्युष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
त्वम॒पो वि दुरो॒ विषू॑ची॒रिन्द्र॑ दृ॒ळ्हम॑रुजः॒ पर्व॑तस्य। राजा॑भवो॒ जग॑तश्चर्षणी॒नां सा॒कं सूर्यं॑ ज॒नय॒न्द्यामु॒षास॑म् ॥५॥

त्वम् । अ॒पः । वि । दुरः॑ । विषू॑चीः । इन्द्र॑ । दृ॒ळ्हम् । अ॒रु॒जः॒ । पर्व॑तस्य । राजा॑ । अ॒भ॒वः॒ । जग॑तः । च॒र्ष॒णी॒नाम् । सा॒कम् । सूर्य॑म् । ज॒नय॑न् । द्याम् । उ॒षस॑म् ॥

Mantra without Swara
त्वमपो वि दुरो विषूचीरिन्द्र दृळ्हमरुजः पर्वतस्य। राजाभवो जगतश्चर्षणीनां साकं सूर्यं जनयन्द्यामुषासम् ॥

त्वम्। अपः। वि। दुरः। विषूचीः। इन्द्र। दृळ्हम्। अरुजः। पर्वतस्य। राजा। अभवः। जगतः। चर्षणीनाम्। साकम्। सूर्यम्। जनयन्। द्याम्। उषसम् ॥५॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 2 Mantra » 5

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Meaning
हे (इन्द्र) अत्यन्त ऐश्वर्य्य के देनेवाले जगदीश्वर ! जैसे सूर्य्य (पर्वतस्य) मेघ के (दृळ्हम्) दृढ़ भाग को भङ्ग करता और (विषूचीः) व्याप्त (दुरः) द्वारों को प्रकाशित करता हुआ (अपः) जलों वा प्राणों को (वि) विशेष कर वर्षाता है तथा (जगतः) संसार के (चर्षणीनाम्) मनुष्यों का (राजा) राजा होता है, वैसे (त्वम्) आप (सूर्य्यम्) सूर्य्य और (द्याम्) प्रकाश को और (उषासम्) दिन के मुख प्रभात को (जनयन्) उत्पन्न करते हुए सबके (साकम्) साथ व्याप्त हुए दुःख को (अरुजः) नष्ट कीजिये और संसार के मनुष्यों के राजा (अभवः) हूजिये ॥५॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जो सूर्य आदि का उत्पन्न करनेवाला, प्रकाशक और धारण करनेवाला तथा सम्पूर्ण पदार्थों में व्याप्त जगदीश्वर है, उसकी आत्मा के साथ निरन्तर उपासना करो ॥५॥ इस सूक्त में इन्द्र, राजा, सूर्य, और ईश्वर के गुणों का वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह तीसवाँ सूक्त और दूसरा वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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