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Rigveda Mandal 6 / Sukta 30 / Mantra 3

75 Sukta
5 Mantra
6/30/3
Devata- इन्द्र: Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ॒द्या चि॒न्नू चि॒त्तदपो॑ न॒दीनां॒ यदा॑भ्यो॒ अर॑दो गा॒तुमि॑न्द्र। नि पर्व॑ता अद्म॒सदो॒ न से॑दु॒स्त्वया॑ दृ॒ळ्हानि॑ सुक्रतो॒ रजां॑सि ॥३॥

अ॒द्य । चि॒त् । नु । चि॒त् । तत् । अपः॑ । न॒दीना॑म् । यत् । आ॒भ्यः॒ । अर॑दः । गा॒तुम् । इ॒न्द्र॒ । नि । पर्व॑ताः । अ॒द्म॒ऽसदः॑ । न । से॒दुः॒ । त्वया॑ । दृ॒ळ्हानि॑ । सु॒क्र॒तो॒ इति॑ सुऽक्रतो । रजां॑सि ॥

Mantra without Swara
अद्या चिन्नू चित्तदपो नदीनां यदाभ्यो अरदो गातुमिन्द्र। नि पर्वता अद्मसदो न सेदुस्त्वया दृळ्हानि सुक्रतो रजांसि ॥

अद्य। चित्। नु। चित्। तत्। अपः। नदीनाम्। यत्। आभ्यः। अरदः। गातुम्। इन्द्र। नि। पर्वताः। अद्मऽसदः। न। सेदुः। त्वया। दृळ्हानि। सुक्रतो इति सुऽक्रतो। रजांसि ॥३॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 2 Mantra » 3

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Meaning
हे (सुक्रतो) श्रेष्ठ कर्मों को उत्तम प्रकार जाननेवाले (इन्द्र) सूर्य के समान वर्त्तमान ! (चित्) जैसे सूर्य (गातुम्) भूमि का (अरदः) आकर्षण करता है तथा (नदीनाम्) नदियों के समीप से (अपः) जलों का आकर्षण करता है और (यत्) जो (आभ्यः) इन नदियों से खैंचता (तत्) वह (चित्) भी वर्षता है, वैसे (अद्याः) आज आप (नू) शीघ्र करिये और जैसे सूर्य से (रजांसि) लोकविशेष (दृळ्हानि) धारण किये गये, वैसे आज (अद्मसदः) उत्तम प्रकार खाने योग्य में स्थित होनेवाले (पर्वताः) मेघ (न) जैसे वैसे (त्वया) रक्षक वा स्वामी आपसे प्रजा और राजजन (नि, सेदुः) स्थित होते हैं ॥३॥
Essence
इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। हे राजन् !जैसे सूर्य सम्पूर्ण पदार्थों से आठ महीने रस धारण करके मेघमण्डल में स्थापित करके वर्षाओं में वर्षाके प्रजाओं को सुखी करता है, वैसे आप आठ मासों में प्रजाओं से कर लेकर वर्षाकाल में देवें ॥३॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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