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Rigveda Mandal 6 / Sukta 30 / Mantra 2

75 Sukta
5 Mantra
6/30/2
Devata- इन्द्र: Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अधा॑ मन्ये बृ॒हद॑सु॒र्य॑मस्य॒ यानि॑ दा॒धार॒ नकि॒रा मि॑नाति। दि॒वेदि॑वे॒ सूर्यो॑ दर्श॒तो भू॒द्वि सद्मा॑न्युर्वि॒या सु॒क्रतु॑र्धात् ॥२॥

अध॑ । म॒न्ये॒ । बृ॒हत् । अ॒सु॒र्य॑म् । अ॒स्य॒ । यानि॑ । दा॒धार॑ । नकिः॑ । आ । मि॒ना॒ति॒ । दि॒वेऽदि॑वे । सूर्यः॑ । द॒र्श॒तः । भू॒त् । वि । सद्मा॑नि । उ॒र्वि॒या । सु॒ऽक्रतुः॑ । धा॒त् ॥

Mantra without Swara
अधा मन्ये बृहदसुर्यमस्य यानि दाधार नकिरा मिनाति। दिवेदिवे सूर्यो दर्शतो भूद्वि सद्मान्युर्विया सुक्रतुर्धात् ॥

अध। मन्ये। बृहत्। असुर्यम्। अस्य। यानि। दाधार। नकिः। आ। मिनाति। दिवेऽदिवे। सूर्यः। दर्शतः। भूत्। वि। सद्मानि। उर्विया। सुऽक्रतुः। धात् ॥२॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 2 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे राजन् ! जैसे (दर्शतः) देखने वा पूछने योग्य (सुक्रतुः) शुभ कर्म करनेवाला (सूर्यः) सूर्य (दिवेदिवे) प्रतिदिन जो (अस्य) इसके (बृहत्) बड़े (असुर्यम्) मेघ के सम्बन्धी का और (यानि) जिन वायुदलों का (दाधार) धारण करता है और इसको (नकिः) नहीं (आ, मिनाति) नष्ट करता है और (उर्विया) पृथिवी के साथ (सद्मानि) स्थानों को (धात्) धारण करता है, वैसे आप (वि, भूत्) होते हैं (अधा) इसके अनन्तर ऐसे हुए आपको राजा मैं (मन्ये) मानता हूँ ॥२॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य प्रतिदिन मेघ को धारण करके वर्षा के पृथिवी और पृथिवीस्थ पदार्थों का नाश नहीं करके धारण करता है, वैसे ही राज्य को धारण करके सुख को वर्षा के प्रजा के साथ न्यायकर्मों को राजा धारण करे ॥२॥
Subject
फिर वह राजा कैसा होवे, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥