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Rigveda Mandal 6 / Sukta 3 / Mantra 7

75 Sukta
8 Mantra
6/3/7
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
दि॒वो न यस्य॑ विध॒तो नवी॑नो॒द्वृषा॑ रु॒क्ष ओष॑धीषु नूनोत्। घृणा॒ न यो ध्रज॑सा॒ पत्म॑ना॒ यन्ना रोद॑सी॒ वसु॑ना॒ दं सु॒पत्नी॑ ॥७॥

दि॒वः । न । यस्य॑ । वि॒ध॒तः । नवी॑नोत् । वृषा॑ । रु॒क्षः । ओष॑धीषु । नू॒नो॒त् । घृणा॑ । न । यः । ध्रज॑सा । पत्म॑ना । यन् । आ । रोद॑सी॒ इति॑ । वसु॑ना । दम् । सु॒पत्नी॒ इति॑ सु॒ऽपत्नी॑ ॥

Mantra without Swara
दिवो न यस्य विधतो नवीनोद्वृषा रुक्ष ओषधीषु नूनोत्। घृणा न यो ध्रजसा पत्मना यन्ना रोदसी वसुना दं सुपत्नी ॥

दिवः। न। यस्य। विधतः। नवीनोत्। वृषा। रुक्षः। ओषधीषु। नूनोत्। घृणा। न। यः। ध्रजसा। पत्मना। यन्। आ। रोदसी इति। वसुना। दम्। सुपत्नी इति सुऽपत्नी ॥७॥

Ashtak » 4 Adhyay » 5 Varga » 4 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
(यस्य) जिस वैद्य के (दिवः) प्रकाश का (न) जैसे वैसे (विधतः) विधान करते हुए का (वृषा) बलिष्ठ (रुक्षः) तेजस्वी जन (नवीनोत्) अत्यन्त स्तुति युक्त होता है तथा (ओषधीषु) ओषधियों के निमित्त (नूनोत्) अत्यन्त स्तुति करता है और (यः) जो (घृणा) दीप्ति (न) जैसे वैसे (ध्रजसा) गमन और (पत्मना) उद्गमन से (वसुना) और धन से (सुपत्नी) सुन्दर स्वामीवाली (रोदसी) अन्तरिक्ष और पृथिवी को (यन्) प्राप्त होनेवाला वह (दम्) इन्द्रियों के निग्रह करनेवाले की (आ) सब ओर से अत्यन्त स्तुति करता है, वह अग्नि सब से जानने के योग्य है ॥७॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । जो अग्नि पृथिवी आदिकों में पूर्ण हुआ घिसने आदि से प्रकाशित होवे, वह मनुष्यों के अनेक प्रकार के कार्य्यों को करनेवाला होता है ॥७॥
Subject
फिर वह कैसा है, इस विषय को कहते हैं ॥