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Rigveda Mandal 6 / Sukta 3 / Mantra 4

75 Sukta
8 Mantra
6/3/4
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ति॒ग्मं चि॒देम॒ महि॒ वर्पो॑ अस्य॒ भस॒दश्वो॒ न य॑मसा॒न आ॒सा। वि॒जेह॑मानः पर॒शुर्न जि॒ह्वां द्र॒विर्न द्रा॑वयति॒ दारु॒ धक्ष॑त् ॥४॥

ति॒ग्मम् । चि॒त् । एम॑ । महि॑ । वर्पः॑ । अ॒स्य॒ । भस॑त् । अश्वः॑ । न । य॒म॒सा॒न । आ॒सा । वि॒ऽजेह॑मानः । प॒र॒शुः । न । जि॒ह्वाम् । द्र॒विः । न । द्र॒व॒य॒ति॒ । दारु॑ । धक्ष॑त् ॥

Mantra without Swara
तिग्मं चिदेम महि वर्पो अस्य भसदश्वो न यमसान आसा। विजेहमानः परशुर्न जिह्वां द्रविर्न द्रावयति दारु धक्षत् ॥

तिग्मम्। चित्। एम। महि। वर्पः। अस्य। भसत्। अश्वः। न। यमसान। आसा। विऽजेहमानः। परशुः। न। जिह्वाम्। द्रविः। न। द्रवयति। दारु। धक्षत् ॥४॥

Ashtak » 4 Adhyay » 5 Varga » 3 Mantra » 4

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Meaning
हे मनुष्यो ! जिस (अस्य) इस विद्वान् के (तिग्मम्) तीव्र (महि) बड़े (वर्पः) रूपका (यमसानः) नियम करता और (विजेहमानः) शब्द करता हुआ (अश्वः) शीघ्र चलनेवाला घोड़ा (न) जैसे वैसे (आसा) मुख से (भसत्) प्रकाशित करता है और (परशुः) कुठार (न) जैसे वैसे (जिह्वाम्) वाणी को (द्रविः) द्रवी होकर उच्चारण की क्रिया (न) जैसे वैसे (द्रावयति) गीला करता है और (दारु) काष्ठ को (धक्षत्) जलावे उसको (चित्) निश्चय से हम लोग (एम) प्राप्त होवें ॥४॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे विद्वन् ! जैसे उत्तम प्रकार से शिक्षित घोड़ा मनुष्य को मार्ग में पहुँचाता है, वैसे धर्ममार्ग को हम लोगों को पहुँचाइये और जैसे बढ़ई परशुसे काष्ठ को काटता है, वैसे हम लोगों के दोषों को काटिये और जैसे तालु से उत्पन्न आर्द्ररस जिह्वा को प्राप्त होता है, वैसे विद्या के रस को प्राप्त कराइये तथा जैसे अग्नि काष्ठों को जलाता है, वैसे ही हमारे दुर्व्यसनों को जलाइये ॥४॥
Subject
फिर विद्वानों को कैसा वर्त्ताव करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

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