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Rigveda Mandal 6 / Sukta 3 / Mantra 2

75 Sukta
8 Mantra
6/3/2
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ई॒जे य॒ज्ञेभिः॑ शश॒मे शमी॑भिर्ऋ॒धद्वा॑राया॒ग्नये॑ ददाश। ए॒वा च॒न तं य॒शसा॒मजु॑ष्टि॒र्नांहो॒ मर्तं॑ नशते॒ न प्रदृ॑प्तिः ॥२॥

ई॒जे । य॒ज्ञेभिः॑ । श॒श॒मे । शमी॑भिः । ऋ॒धत्ऽवा॑राय । अ॒ग्नये॑ । द॒दा॒श॒ । ए॒व । च॒न । तम् । य॒शसा॑म् । अजु॑ष्टिः । न । अंहः॑ । मर्त॑म् । न॒श॒ते॒ । न । प्रऽदृ॑प्तिः ॥

Mantra without Swara
ईजे यज्ञेभिः शशमे शमीभिर्ऋधद्वारायाग्नये ददाश। एवा चन तं यशसामजुष्टिर्नांहो मर्तं नशते न प्रदृप्तिः ॥

ईजे। यज्ञेभिः। शशमे। शमीभिः। ऋधत्ऽवाराय। अग्नये। ददाश। एव। चन। तम्। यशसाम्। अजुष्टिः। न। अंहः। मर्तम्। नशते। न। प्रऽदृप्तिः ॥२॥

Ashtak » 4 Adhyay » 5 Varga » 3 Mantra » 2

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Meaning
जो विद्वान् (यज्ञेभिः) विद्वानों की सेवा और सत्य भाषण आदिकों के साथ (ईजे) उत्तम प्रकार मिलता है और (शमीभिः) शुभ कर्म्मों से (शशमे) शान्त होता है (ऋधद्वाराय) उत्तम प्रकार बढ़ानेवाला सत्य स्वीकार करने योग्य व्यवहार जिसका उस (अग्नये) अग्नि के सदृश वर्त्तमान सुपात्र के लिये (ददाश) देता है (तम्) उसको (एवा) ही (चन) निश्चय से (मर्त्तम्) मनुष्य को और (यशसाम्) धनों वा अन्नों का (अजुष्टिः) असेवन (न) जैसे वैसे (अंहः) अपराध (न) नहीं (नशते) प्राप्त होता है और (प्रदृप्तिः) अत्यन्त मोह प्राप्त होता है ॥२॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो सत्यभाषण आदि धर्म्म के अनुष्ठान करनेवाले योगी अभय देनेवाले हैं, वे पाप और मोह का त्याग करके विज्ञान को प्राप्त होकर सुखी होते हैं ॥२॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

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