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Rigveda Mandal 6 / Sukta 29 / Mantra 5

75 Sukta
6 Mantra
6/29/5
Devata- इन्द्र: Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
न ते॒ अन्तः॒ शव॑सो धाय्य॒स्य वि तु बा॑बधे॒ रोद॑सी महि॒त्वा। आ ता सू॒रिः पृ॑णति॒ तूतु॑जानो यू॒थेवा॒प्सु स॒मीज॑मान ऊ॒ती ॥५॥

न । ते॒ । अन्तः॑ । शव॑सः । धा॒यि॒ । अ॒स्य । वि । तु । बा॒ब॒धे॒ । रोद॑सी॒ इति॑ । म॒हि॒ऽत्वा । आ । ता । सू॒रिः । पृ॒ण॒ति॒ । तूतु॑जानः । यू॒थाऽइ॑व । अ॒प्ऽसु । स॒म्ऽईज॑मानः । ऊ॒ती ॥

Mantra without Swara
न ते अन्तः शवसो धाय्यस्य वि तु बाबधे रोदसी महित्वा। आ ता सूरिः पृणति तूतुजानो यूथेवाप्सु समीजमान ऊती ॥

न। ते। अन्तः। शवसः। धायि। अस्य। वि। तु। बाबधे। रोदसी इति। महिऽत्वा। आ। ता। सूरिः। पृणति। तूतुजानः। यूथाऽइव। अप्ऽसु। सम्ऽईजमानः। ऊती ॥५॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 1 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे जगदीश्वर ! जिस (अस्य) इस (ते) आप ईश्वर के (शवसः) बल की (अन्तः) सीमा किसी से भी (न) नहीं (धायि) धारण की जाती है (तु) और जो (महित्वा) बड़प्पन से (रोदसी) अन्तरिक्ष और पृथिवी को (वि, बाबधे) बाँधता है और जिन आपके (ता) उन कर्मों को (ऊती) रक्षण आदि क्रिया से (समीजमानः) उत्तम प्रकार मिलता हुआ (तूतुजानः) शीघ्र कार्य करनेवाला (सूरिः) विद्वान् (अप्सु) प्राणों वा जलों में (यूथेव) समूह के सदृश सब को (आ, पृणति) सुखी करता है, वह आप लोगों से स्तुति करने योग्य है ॥५॥
Essence
हे मनुष्यो ! जो अनन्त गुण, कर्म और स्वभावयुक्त और सब का प्रबन्ध करनेवाला, उपासना किया हुआ सुख का देनेवाला ईश्वर है, वही सब से उपासना करने योग्य है ॥५॥
Subject
अब ईश्वर कैसा है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥