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Rigveda Mandal 6 / Sukta 27 / Mantra 5

75 Sukta
8 Mantra
6/27/5
Devata- इन्द्र: Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
वधी॒दिन्द्रो॑ व॒रशि॑खस्य॒ शेषो॑ऽभ्याव॒र्तिने॑ चायमा॒नाय॒ शिक्ष॑न्। वृ॒चीव॑तो॒ यद्ध॑रियू॒पीया॑यां॒ हन्पूर्वे॒ अर्धे॑ भि॒यसाप॑रो॒ दर्त् ॥५॥

वधी॑त् । इन्द्रः॑ । व॒रऽशि॑खस्य । शेषः॑ । अ॒भि॒ऽआ॒व॒र्तिने॑ । चा॒य॒मा॒नाय॑ । शिक्ष॑न् । वृ॒चीव॑तः । यत् । ह॒रि॒यू॒पीया॑याम् । हन् । पूर्वे॑ । अर्धे॑ । भि॒यसा॑ । अप॑रः । दर्त् ॥

Mantra without Swara
वधीदिन्द्रो वरशिखस्य शेषोऽभ्यावर्तिने चायमानाय शिक्षन्। वृचीवतो यद्धरियूपीयायां हन्पूर्वे अर्धे भियसापरो दर्त् ॥

वधीत्। इन्द्रः। वरऽशिखस्य। शेषः। अभिऽआवर्तिने। चायमानाय। शिक्षन्। वृचीवतः। यत्। हरियूपीयायाम्। हन्। पूर्वे। अर्धे। भियसा। अपरः। दर्त् ॥५॥

Ashtak » 4 Adhyay » 6 Varga » 23 Mantra » 5

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Meaning
हे मनुष्यो ! (यत्) जो (शेषः) अवशिष्ट (इन्द्रः) सूर्य (वृचीवतः) अविद्या का छेदन प्रशंसित जिसके उस (वरशिखस्य) श्रेष्ठ शिखावाले के समान मेघ के (अभ्यावर्त्तिने) चारों ओर घूमनेवाले के लिये जैसे वैसे (चायमानाय) सत्कार करनेवाले के लिये (शिक्षन्) विद्या देता हुआ (भियसा) भय से (हरियूपीयायाम्) विचारशील मनुष्यों की इच्छा करते हुओं की पान क्रिया में (पूर्वे) सन्मुख (अर्द्धे) अर्द्धभाग में (हन्) नाश करता वा (वधीत्) नाश करे (अपरः) अन्य बिजुलीरूप अग्नि उसको (दर्त्) विदीर्ण करता है, वैसे वर्त्तमान उपदेश का हम लोग सत्कार करें ॥५॥
Essence
जो मनुष्य पूर्व अवस्था में विद्वानों से विद्या ग्रहण करके बुरे व्यसनों का त्याग करके उत्तमस्वभावयुक्त होते हैं, वे अधर्माचरण से डरते हैं ॥५॥
Subject
फिर वह कैसा है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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