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Rigveda Mandal 6 / Sukta 26 / Mantra 1

75 Sukta
8 Mantra
6/26/1
Devata- इन्द्र: Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
श्रु॒धी न॑ इन्द्र॒ ह्वया॑मसि त्वा म॒हो वाज॑स्य सा॒तौ वा॑वृषा॒णाः। सं यद्विशोऽय॑न्त॒ शूर॑साता उ॒ग्रं नोऽवः॒ पार्ये॒ अह॑न्दाः ॥१॥

श्रु॒धि । नः॒ । इ॒न्द्र॒ । ह्वया॑मसि । त्वा॒ । म॒हः । वाज॑स्य । सा॒तौ । व॒वृ॒षा॒णाः । सम् । यत् । विशः॑ । अय॑न्त । शूर॑ऽसातौ । उ॒ग्रम् । नः॒ । अवः॑ । पार्ये॑ । अह॑न् । दाः॒ ॥

Mantra without Swara
श्रुधी न इन्द्र ह्वयामसि त्वा महो वाजस्य सातौ वावृषाणाः। सं यद्विशोऽयन्त शूरसाता उग्रं नोऽवः पार्ये अहन्दाः ॥

श्रुधि। नः। इन्द्र। ह्वयामसि। त्वा। महः। वाजस्य। सातौ। ववृषाणाः। सम्। यत्। विशः। अयन्त। शूरऽसातौ। उग्रम्। नः। अवः। पार्ये। अहन्। दाः ॥१॥

Ashtak » 4 Adhyay » 6 Varga » 21 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) राजन् ! (वावृषाणाः) बल को करते हुए (विशः) मनुष्य आदि प्रजा हम लोग (महः) बड़े (वाजस्य) वेग आदि गुणों से युक्त के (सातौ) शूरों का विभाग जिसमें उस संग्राम में (यत्) जिससे (त्वा) आपको (ह्वयामसि) जनावें, जिससे आप (नः) हम लोगों के लिये वचनों को (श्रुधी) सुनिये और जो (शूरसातौ) शूरों का विभाग जिसमें उस संग्राम में (नः) हम लोगों को (सम्, अयन्त) प्राप्त होते हैं, उस (पार्ये) पालन करने योग्य (अहन्) दिन में (उग्रम्) तेजस्वी को (अवः) रक्षण (दाः) दीजिये ॥१॥
Essence
राजाओं को यह अतियोग्य है कि जो प्रजा कहे उसको ध्यान से सुनें, जिससे राजा और प्रजाजनों का विरोध न होवे और प्रतिदिन सुख बढ़े ॥१॥
Subject
अब आठ ऋचावाले छब्बीसवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में राजा और प्रजाजन परस्पर कैसा बर्ताव करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥