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Rigveda Mandal 6 / Sukta 24 / Mantra 8

75 Sukta
10 Mantra
6/24/8
Devata- इन्द्र: Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
न वी॒ळवे॒ नम॑ते॒ न स्थि॒राय॒ न शर्ध॑ते॒ दस्यु॑जूताय स्त॒वान्। अज्रा॒ इन्द्र॑स्य गि॒रय॑श्चिदृ॒ष्वा ग॑म्भी॒रे चि॑द्भवति गा॒धम॑स्मै ॥८॥

न । वी॒ळवे॑ । नम॑ते । न । स्थि॒राय॑ । न । शर्ध॑ते । दस्यु॑ऽजूताय । स्त॒वान् । अज्राः॑ । इन्द्र॑स्य । गि॒रयः॑ । चित् । ऋ॒ष्वाः । ग॒म्भी॒रे । चि॒त् । भ॒व॒ति॒ । गा॒धम् । अ॒स्मै॒ ॥

Mantra without Swara
न वीळवे नमते न स्थिराय न शर्धते दस्युजूताय स्तवान्। अज्रा इन्द्रस्य गिरयश्चिदृष्वा गम्भीरे चिद्भवति गाधमस्मै ॥

न। वीळवे। नमते। न। स्थिराय। न। शर्धते। दस्युऽजूताय। स्तवान्। अज्राः। इन्द्रस्य। गिरयः। चित्। ऋष्वाः। गम्भीरे। चित्। भवति। गाधम्। अस्मै ॥८॥

Ashtak » 4 Adhyay » 6 Varga » 18 Mantra » 3

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Meaning
हे विद्वानो ! जो (दस्युजूताय) दुष्टों के सङ्ग के लिये (वीळवे) प्रशंसा करने योग्य बल के लिये (न) नहीं (नमते) नम्र होता (स्थिराय) स्थिर गम्भीर पुरुष के लिये (न) नहीं नम्र होता तथा (शर्द्धते) बल के लिये (न) नहीं (स्तवान्) स्तुति करे जिस (इन्द्रस्य) बिजुली के (ऋष्वाः) बड़े (अज्राः) फेंकनेवाले गुण (गिरयः) मेघों के (चित्) सदृश हैं (अस्मै) इसके लिये (गाधम्) ग्रहण किया परिमाण (गम्भीरे) गुरुपन में (चित्) भी (भवति) होता है, उसकी प्रशंसा करिये ॥८॥
Essence
जैसे बिजुलियाँ अथाह गुणवाली हैं, वैसे ही परमात्मा के असङ्ख्य गुण हैं और जो परमात्मा और यथार्थवक्ता जनों को त्याग करके दुष्टों का संग करते हैं, वे सब काल में दुःखी होते हैं ॥८॥
Subject
फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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