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Rigveda Mandal 6 / Sukta 24 / Mantra 4

75 Sukta
10 Mantra
6/24/4
Devata- इन्द्र: Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
शची॑वतस्ते पुरुशाक॒ शाका॒ गवा॑मिव स्रु॒तयः॑ सं॒चर॑णीः। व॒त्सानां॒ न त॒न्तय॑स्त इन्द्र॒ दाम॑न्वन्तो अदा॒मानः॑ सुदामन् ॥४॥

शची॑ऽवतः । ते॒ । पु॒रु॒ऽशा॒क॒ । शाकाः॑ । गवा॑म्ऽइव । स्रु॒तयः॑ । स॒म्ऽचर॑णीः । व॒त्साना॑म् । न । त॒न्तयः॑ । ते॒ । इ॒न्द्र॒ । दाम॑न्ऽवन्तः । अ॒दा॒मानः॑ । सु॒ऽदा॒म॒न् ॥

Mantra without Swara
शचीवतस्ते पुरुशाक शाका गवामिव स्रुतयः संचरणीः। वत्सानां न तन्तयस्त इन्द्र दामन्वन्तो अदामानः सुदामन् ॥

शचीऽवतः। ते। पुरुऽशाक। शाकाः। गवाम्ऽइव। स्रुतयः। सम्ऽचरणीः। वत्सानाम्। न। तन्तयः। ते। इन्द्र। दामन्ऽवन्तः। अदामानः। सुऽदामन् ॥४॥

Ashtak » 4 Adhyay » 6 Varga » 17 Mantra » 4

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Meaning
हे (पुरुशाक) बहुत सामर्थ्यवान् (इन्द्र) दुःख के नाश करनेवाले ! (शचीवतः) बुद्धि और प्रजा से युक्त (ते) आपकी (गवामिव, स्रुतयः) गौओं की गतियों के सदृश (सञ्चरणीः) अच्छे प्रकार चलनेवाली भूमियाँ (शाकाः) और सामर्थ्य वाली (वत्सानाम्) बछड़ों की (तन्तयः) विस्तृत पङ्क्तियों के (न) सदृश (ते) आपकी प्रजा हैं। हे (सुदामन्) अच्छे नियमों में बँधे हुए ! जो (दामन्वन्तः) बहुत बन्धनोंवाले होवें वे आप से (अदामानः) बन्धनरहित करने योग्य हैं ॥४॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। वे ही राजाजन प्रशंसित प्रतापवाले होते हैं, जो अन्याय और पीड़ा आदि के बन्धन से प्रजाओं को छुड़ा कर धर्ममार्ग में चलाते हैं और जैसे बछड़ों की बढ़ानेवाली गौ होती हैं, वैसे ही प्रजा के बढ़ानेवाले राजपुरुष हों ॥४॥
Subject
फिर राजा और प्रजा को कैसा वर्त्ताव करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

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