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Rigveda Mandal 6 / Sukta 23 / Mantra 8

75 Sukta
10 Mantra
6/23/8
Devata- इन्द्र: Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
स म॑न्दस्वा॒ ह्यनु॒ जोष॑मुग्र॒ प्र त्वा॑ य॒ज्ञास॑ इ॒मे अ॑श्नुवन्तु। प्रेमे हवा॑सः पुरुहू॒तम॒स्मे आ त्वे॒यं धीरव॑स इन्द्र यम्याः ॥८॥

सः । म॒न्द॒स्व॒ । हि । अनु॑ । जोष॑म् । उ॒ग्र॒ । प्र । त्वा॒ । य॒ज्ञासः॑ । इ॒मे । अ॒श्नु॒व॒न्तु॒ । प्र । इ॒मे । हवा॑सः । पु॒रु॒ऽहू॒तम् । अ॒स्मे इति॑ । आ । त्वा॒ । इ॒यम् । धीः । अव॑से । इ॒न्द्र॒ । य॒म्याः॒ ॥

Mantra without Swara
स मन्दस्वा ह्यनु जोषमुग्र प्र त्वा यज्ञास इमे अश्नुवन्तु। प्रेमे हवासः पुरुहूतमस्मे आ त्वेयं धीरवस इन्द्र यम्याः ॥

सः। मन्दस्व। हि। अनु। जोषम्। उग्र। प्र। त्वा। यज्ञासः। इमे। अश्नुवन्तु। प्र। इमे। हवासः। पुरुऽहूतम्। अस्मे इति। आ। त्वा। इयम्। धीः। अवसे। इन्द्र। यम्याः ॥८॥

Ashtak » 4 Adhyay » 6 Varga » 16 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (उग्र) तेजस्विन् (इन्द्र) विद्या और क्रिया में कुशल ! जिस बुद्धि से (इमे) ये (यज्ञासः) सम्पूर्ण धर्मयुक्त व्यवहार (त्वा) आपको (अश्नुवन्तु) प्राप्त हों और जो (इमे) ये (हवासः) दान, आदान और अदन नामक अर्थात् देना, लेना, खाना (पुरुहूतम्) बहुतों से प्रशंसित (त्वा) आपको (प्र) प्राप्त हों सो (इयम्) यह (धीः) बुद्धि (अस्मे) हम लोगों की वा हम लोगों में (अवसे) रक्षा के लिये हो आप उसको (आ, यम्याः) अच्छे प्रकार विस्तारिये तथा हम लोगों में (प्र) अच्छे प्रकार दीजिये उनके साथ (हि) जिससे (जोषम्) प्रीति को (अनु) अनुकूल (सः) वह आप (मन्दस्वा) आनन्द करिये ॥८॥
Essence
हे मनुष्यो ! जिन कर्मों और जिस बुद्धि से विज्ञान और आनन्द बढ़ते हैं, उनकी आप लोग वृद्धि करिये ॥८॥
Subject
फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥