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Rigveda Mandal 6 / Sukta 23 / Mantra 5

75 Sukta
10 Mantra
6/23/5
Devata- इन्द्र: Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अस्मै॑ व॒यं यद्वा॒वान॒ तद्वि॑विष्म॒ इन्द्रा॑य॒ यो नः॑ प्र॒दिवो॒ अप॒स्कः। सु॒ते सोमे॑ स्तु॒मसि॒ शंस॑दु॒क्थेन्द्रा॑य॒ ब्रह्म॒ वर्ध॑नं॒ यथास॑त् ॥५॥

अस्मै॑ । व॒यम् । यत् । व॒वान॑ । तत् । वि॒वि॒ष्मः॒ । इन्द्रा॑य । यः । नः॒ । प्र॒ऽदिवः । अपः॑ । क॒रिति॑ कः । सु॒ते । सोमे॑ । स्तु॒मसि॑ । शंस॑त् । उ॒क्था । इन्द्रा॑य । ब्रह्म॑ । वर्ध॑नम् । यथा॑ । अस॑त् ॥

Mantra without Swara
अस्मै वयं यद्वावान तद्विविष्म इन्द्राय यो नः प्रदिवो अपस्कः। सुते सोमे स्तुमसि शंसदुक्थेन्द्राय ब्रह्म वर्धनं यथासत् ॥

अस्मै। वयम्। यत्। ववान। तत्। विविष्मः। इन्द्राय। यः। नः। प्रऽदिवः। अपः। करिति कः। सुते। सोमे। स्तुमसि। शंसत्। उक्था। इन्द्राय। ब्रह्म। वर्धनम्। यथा। असत् ॥५॥

Ashtak » 4 Adhyay » 6 Varga » 15 Mantra » 5

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Meaning
हे मनुष्यो ! (यः) जो (प्रदिवः) अत्यन्तपन से कामना करते हुओं (नः) हमलोगों और (अपः) कर्म को (कः) करता है और (इन्द्राय) अत्यन्त ऐश्वर्ययुक्त जन के लिये (उक्था) प्रशंसा करने योग्य कर्मों को (शंसत्) कहे और (यथा) जैसे (ब्रह्म) धन (वर्धनम्) बढ़ता है जिससे वह (असत्) होवे और (अस्मै) पूर्व मन्त्र में कहे हुए (इन्द्राय) ऐश्वर्य के लिये (वयम्) हम लोग (यत्) जिसको (विविष्मः) व्याप्त होते हैं (तत्) उसका जो (वावान) उत्तम प्रकार सेवन करता है, वैसे उसकी (सुते) उत्पन्न किये गये (सोम) ऐश्वर्य में हम लोग (स्तुमसि) स्तुति करते हैं ॥५॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो धन के सदृश सब के बढ़ानेवाले हैं, वे अत्यन्त ऐश्वर्य को प्राप्त होकर प्रयत्न करते हैं ॥५॥
Subject
फिर मनुष्यों को परस्पर कैसा वर्त्ताव करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

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