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Rigveda Mandal 6 / Sukta 23 / Mantra 3

75 Sukta
10 Mantra
6/23/3
Devata- इन्द्र: Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
पाता॑ सु॒तमिन्द्रो॑ अस्तु॒ सोमं॑ प्रणे॒नीरु॒ग्रो ज॑रि॒तार॑मू॒ती। कर्ता॑ वी॒राय॒ सुष्व॑य उ लो॒कं दाता॒ वसु॑ स्तुव॒ते की॒रये॑ चित् ॥३॥

पाता॑ । सु॒तम् । इन्द्रः॑ । अ॒स्तु॒ । सोम॑म् । प्र॒ऽने॒नीः । उ॒ग्रः । ज॒रि॒तार॑म् । ऊ॒ती । कर्ता॑ । वी॒राय॑ । सुस्व॑ये । ऊ॒म्ँम् इति॑ । लो॒कम् । दाता॑ । वसु॑ । स्तु॒व॒ते । की॒रये॑ । चि॒त् ॥

Mantra without Swara
पाता सुतमिन्द्रो अस्तु सोमं प्रणेनीरुग्रो जरितारमूती। कर्ता वीराय सुष्वय उ लोकं दाता वसु स्तुवते कीरये चित् ॥

पाता। सुतम्। इन्द्रः। अस्तु। सोमम्। प्रऽनेनीः। उग्रः। जरितारम्। ऊती। कर्ता। वीराय। सुस्वये। ऊँ इति। लोकम्। दाता। वसु। स्तुवते। कीरये। चित् ॥३॥

Ashtak » 4 Adhyay » 6 Varga » 15 Mantra » 3

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Meaning
हे मनुष्यो ! जो (ऊती) रक्षण आदि क्रिया से (प्रणेनीः) अत्यन्त न्याय करने और (पाता) रक्षा करनेवाला (उग्रः) तेजस्वी (इन्द्रः) ऐश्वर्यकारी राजा (सुतम्) उत्पन्न किये गये (सोमम्) सोमलता आदि ओषधियों के रस को और (जरितारम्) स्तुति करनेवाले को करता है, वह हम लोगों का राजा हो और जो (उ) तर्क-वितर्क से (वीराय) पराक्रमयुक्त (सुष्वये) उत्तम प्रकार अच्छे पदार्थों के उत्पन्न करनेवाले (स्तुवते) स्तुति करते हुए (कीरये) स्तुति करनेवाले के लिये (दाता) दाता और (कर्ता) कार्य करनेवाला (लोकम्) लोक को (वसु) और धन को (चित्) भी करता है, वह हम लोगों का अग्रणी (अस्तु) हो ॥३॥
Essence
हे मनुष्यो ! उसी को राजा मानो, जो सम्पूर्ण शास्त्रों का जाननेवाला, पुरुषार्थी, धार्मिक और इन्द्रियों को वश में रखनेवाला होवे ॥३॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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