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Rigveda Mandal 6 / Sukta 23 / Mantra 2

75 Sukta
10 Mantra
6/23/2
Devata- इन्द्र: Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- स्वराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
यद्वा॑ दि॒वि पार्ये॒ सुष्वि॑मिन्द्र वृत्र॒हत्येऽव॑सि॒ शूर॑सातौ। यद्वा॒ दक्ष॑स्य बि॒भ्युषो॒ अबि॑भ्य॒दर॑न्धयः॒ शर्ध॑त इन्द्र॒ दस्यू॑न् ॥२॥

यत् । वा॒ । दि॒वि । पार्ये॑ । सुस्वि॑म् । इ॒न्द्र॒ । वृ॒त्र॒ऽहत्ये॑ । व॑सि । शूर॑ऽसातौ । यत् । वा॒ । दक्ष॑स्य । बि॒भ्युषः॑ । अबि॑भ्यत् । अर॑न्धयः । शर्ध॑तः । इ॒न्द्र॒ । दस्यू॑न् ॥

Mantra without Swara
यद्वा दिवि पार्ये सुष्विमिन्द्र वृत्रहत्येऽवसि शूरसातौ। यद्वा दक्षस्य बिभ्युषो अबिभ्यदरन्धयः शर्धत इन्द्र दस्यून् ॥

यत्। वा। दिवि। पार्ये। सुस्विम्। इन्द्र। वृत्रऽहत्ये। अवसि। शूरऽसातौ। यत्। वा। दक्षस्य। बिभ्युषः। अबिभ्यत्। अरन्धयः। शर्धतः। इन्द्र। दस्यून् ॥२॥

Ashtak » 4 Adhyay » 6 Varga » 15 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) दुष्ट जनों के नाश करनेवाले (यत्) जो आप (पार्ये) पार में हुए (दिवि) कामना करने योग्य के निमित्त (वृत्रहत्ये) मेघ के हनन (वा) वा (शूरसातौ) शूर जनों से विभाग करने योग्य संग्राम में (सुष्विम्) उत्तम प्रकार उत्पन्न करनेवाले की (अवसि) रक्षा करते हो और (यत्) जो (वा) वा आप (दक्षस्य) बली (बिभ्युषः) भय करनेवाले का (अबिभ्यत्) भय करते हैं वह आप हे (इन्द्र) प्रतापी जन ! (शर्धतः) बलयुक्त से (दस्यून्) हठ से दूसरे के पदार्थ ग्रहण करनेवालों का (अरन्धयः) नाश करिये ॥२॥
Essence
वही राजा होने को योग्य होवे कि जो युद्ध में अपनी सेना की रक्षा करे और शत्रु तथा चोरों का नाश करे ॥२॥
Subject
फिर वह राजा क्या करे, इस विषय को कहते हैं ॥