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Rigveda Mandal 6 / Sukta 23 / Mantra 10

75 Sukta
10 Mantra
6/23/10
Devata- इन्द्र: Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ए॒वेदिन्द्रः॑ सु॒ते अ॑स्तावि॒ सोमे॑ भ॒रद्वा॑जेषु॒ क्षय॒दिन्म॒घोनः॑। अस॒द्यथा॑ जरि॒त्र उ॒त सू॒रिरिन्द्रो॑ रा॒यो वि॒श्ववा॑रस्य दा॒ता ॥१०॥

ए॒व । इत् । इन्द्रः॑ । सु॒ते । अ॒स्ता॒वि॒ । सोमे॑ । भ॒रत्ऽवा॑जेषु । क्षय॑त् । इत् । म॒घोनः॑ । अस॑त् । यथा॑ । ज॒रि॒त्रे । उ॒त । सू॒रिः । इन्द्रः॑ । रा॒यः । वि॒श्वऽवा॑रस्य । दा॒ता ॥

Mantra without Swara
एवेदिन्द्रः सुते अस्तावि सोमे भरद्वाजेषु क्षयदिन्मघोनः। असद्यथा जरित्र उत सूरिरिन्द्रो रायो विश्ववारस्य दाता ॥

एव। इत्। इन्द्रः। सुते। अस्तावि। सोमे। भरत्ऽवाजेषु। क्षयत्। इत्। मघोनः। असत्। यथा। जरित्रे। उत। सूरिः। इन्द्रः। रायः। विश्वऽवारस्य। दाता ॥१०॥

Ashtak » 4 Adhyay » 6 Varga » 16 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो (यथा) जैसे (इन्द्रः) अत्यन्त ऐश्वर्यवाला जन (सुते) उत्पन्न हुए इस संसार में (सोमे) ऐश्वर्य में (इत्) निश्चय (भरद्वाजेषु) विज्ञान को धारण किए हुओं में (अस्तावि) स्तुति किया जाता है और जैसे (सूरिः) विद्वान् और (इन्द्र) अत्यन्त ऐश्वर्य से युक्त जन (जरित्रे) स्तुति करनेवाले जन के लिये (विश्ववारस्य) सम्पूर्ण स्वीकार जिसमें उस (रायः) धन का (दाता) देनेवाला (उत) निश्चय से (क्षयत्) निवास करे और (इत्) निश्चय कर (मघोनः) धन से युक्त जनों की रक्षा करता हुआ हो वह (एव) ही उस प्रकार का सुखी (असत्) होवे ॥१०॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो मनुष्य इस संसार में धर्मयुक्त कर्म्म करते हैं, वे सर्वदा स्तुति किये जाते हैं, जैसा देना प्रियकारक होता है, वैसा लेना नहीं प्रियकारक होता है ॥१०॥ इस सूक्त में इन्द्र, विद्वान्, राजा और प्रजा के गुणवर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह ऋग्वेदभाष्य के छठे मण्डल में दूसरा अनुवाक, तेईसवाँ सूक्त और सोलहवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥