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Rigveda Mandal 6 / Sukta 22 / Mantra 9

75 Sukta
11 Mantra
6/22/9
Devata- इन्द्र: Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
भुवो॒ जन॑स्य दि॒व्यस्य॒ राजा॒ पार्थि॑वस्य॒ जग॑तस्त्वेषसंदृक्। धि॒ष्व वज्रं॒ दक्षि॑ण इन्द्र॒ हस्ते॒ विश्वा॑ अजुर्य दयसे॒ वि मा॒याः ॥९॥

भुवः॑ । जन॑स्य । दि॒व्यस्य॑ । राजा॑ । पार्थि॑वस्य । जग॑तः । त्वे॒ष॒ऽस॒न्दृ॒क् । धि॒ष्व । वज्र॑म् । दक्षि॑णे । इ॒न्द्र॒ । हस्ते॑ । विश्वा॑ । अ॒जु॒र्य॒ । द॒य॒से॒ । वि । मा॒याः ॥

Mantra without Swara
भुवो जनस्य दिव्यस्य राजा पार्थिवस्य जगतस्त्वेषसंदृक्। धिष्व वज्रं दक्षिण इन्द्र हस्ते विश्वा अजुर्य दयसे वि मायाः ॥

भुवः। जनस्य। दिव्यस्य। राजा। पार्थिवस्य। जगतः। त्वेषऽसन्दृक्। धिष्व। वज्रम्। दक्षिणे। इन्द्र। हस्ते। विश्वा। अजुर्य। दयसे। वि। मायाः ॥९॥

Ashtak » 4 Adhyay » 6 Varga » 14 Mantra » 4

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Meaning
हे (अजुर्य) जीर्ण अवस्था से रहित (इन्द्र) अत्यन्त ऐश्वर्य के देनेवाले (राजा) प्रकाशमान आप (भुवः) पृथिवी और (पार्थिवस्य) पृथिवी में हुए (जगतः) संसार और (दिव्यस्य) शुद्ध कामना करने योग्य सुन्दर (जनस्य) मनुष्य के (त्वेषसन्दृक्) न्यायप्रकाश को देखनेवाले होते हुए (दक्षिणे) दाहिने (हस्ते) हाथ में (वज्रम्) शस्त्र और अस्त्र को (धिष्व) धारण करिये और (विश्वाः) सम्पूर्ण (मायाः) बुद्धियों को (वि, दयसे) विशेष करके दीजिये ॥९॥
Essence
वही राजा उत्तम है जो न्यायशील, धार्मिक, जितेन्द्रिय होकर सम्पूर्ण जगत् का पिता के समान पालन करके सम्पूर्ण विद्याओं को अच्छे प्रकार देता है ॥९॥
Subject
फिर वह राजा क्या करे, इस विषय को कहते हैं ॥

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