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Rigveda Mandal 6 / Sukta 22 / Mantra 4

75 Sukta
11 Mantra
6/22/4
Devata- इन्द्र: Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
तन्नो॒ वि वो॑चो॒ यदि॑ ते पु॒रा चि॑ज्जरि॒तार॑ आन॒शुः सु॒म्नमि॑न्द्र। कस्ते॑ भा॒गः किं वयो॑ दुध्र खिद्वः॒ पुरु॑हूत पुरूवसोऽसुर॒घ्नः ॥४॥

तत् । नः॒ । वि । वो॒चः॒ । यदि॑ । ते॒ । पु॒रा । चि॒त् । ज॒रि॒तारः॑ । आ॒न॒शुः । सु॒म्नम् । इ॒न्द्र॒ । कः । ते॒ । भा॒गः । किम् । वयः॑ । दु॒ध्र॒ । खि॒द्वः॒ । पुरु॑ऽहूत । पु॒रु॒व॒सो॒ इति॑ पुरुऽवसो । अ॒सु॒र॒ऽघ्नः ॥

Mantra without Swara
तन्नो वि वोचो यदि ते पुरा चिज्जरितार आनशुः सुम्नमिन्द्र। कस्ते भागः किं वयो दुध्र खिद्वः पुरुहूत पुरूवसोऽसुरघ्नः ॥

तत्। नः। वि। वोचः। यदि। ते। पुरा। चित्। जरितारः। आनशुः। सुम्नम्। इन्द्र। कः। ते। भागः। किम्। वयः। दुध्र। खिद्वः। पुरुऽहूत। पुरुवसो इति पुरुऽवसो। असुरऽघ्नः ॥४॥

Ashtak » 4 Adhyay » 6 Varga » 13 Mantra » 4

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Meaning
हे (दुध्र) दुःख से धारण करने योग्य और (पुरुहूत) बहुतों से सत्कार किये गये (पुरूवसो) बहुत धनों से युक्त (इन्द्र) विद्या और गुणों की स्तुति करनेवाले ! (यदि) जो आप (नः) हम लोगों के लिये (तत्) उसको (वि, वोचः) विशेष कहिये जिसको (चित्) निश्चित (ते) आपके (पुरा) पहिले भी (जरितारः) विद्या और गुणों की स्तुति करनेवाले (सुम्नम्) सुख का (आनशुः) भोग करते हैं (ते) आपका (कः) कौन (असुरघ्नः) दुष्ट कर्मकारियों का नाश करनेवाला (भागः) अंश (खिद्वः) दीन और (किम्) कौन (वयः) जीवन है, इसको आप कहिये ॥४॥
Essence
हे विद्वन् ! आपको वह विज्ञान हम लोगों के लिये देने योग्य है, जिससे विद्वान् जन आनन्द करते हैं ॥४॥
Subject
फिर विद्वान् क्या करे, इस विषय को कहते हैं ॥

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