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Rigveda Mandal 6 / Sukta 22 / Mantra 11

75 Sukta
11 Mantra
6/22/11
Devata- इन्द्र: Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
स नो॑ नि॒युद्भिः॑ पुरुहूत वेधो वि॒श्ववा॑राभि॒रा ग॑हि प्रयज्यो। न या अदे॑वो॒ वर॑ते॒ न दे॒व आभि॑र्याहि॒ तूय॒मा म॑द्र्य॒द्रिक् ॥११॥

सः । नः॒ । नि॒युत्ऽभिः॑ । पु॒रु॒ऽहू॒त॒ । वे॒धः॒ । वि॒श्वऽवा॑राभिः । आ । ग॒हि॒ । प्र॒य॒ज्यो॒ इति॑ प्रऽयज्यो । न । याः । अदे॑वः । वर॑ते । न । दे॒वः । आ । आ॒भिः॒ । या॒हि॒ । तूय॑म् । आ । म॒द्र्य॒द्रिक् ॥

Mantra without Swara
स नो नियुद्भिः पुरुहूत वेधो विश्ववाराभिरा गहि प्रयज्यो। न या अदेवो वरते न देव आभिर्याहि तूयमा मद्र्यद्रिक् ॥

सः। नः। नियुत्ऽभिः। पुरुऽहूत। वेधः। विश्वऽवाराभिः। आ। गहि। प्रयज्यो इति प्रऽयज्यो। न। याः। अदेवः। वरते। न। देवः। आ। आभिः। याहि। तूयम्। आ। मद्र्यद्रिक् ॥११॥

Ashtak » 4 Adhyay » 6 Varga » 14 Mantra » 6

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1 Bhashyas
Meaning
हे (प्रयज्यो) अत्यन्त यज्ञ करनेवाले (पुरुहूत) बहुतों से आदर किये गये (वेधः) बुद्धियुक्त (सः) वह आप (देवः) विद्वान् के (न) समान (विश्ववाराभिः) सब से स्वीकार करने योग्य गमनों से और (आभिः) इन (नियुद्भिः) निश्चित गमनवाले घोड़ों से जैसे वैसे (नः) हम लोगों को (आ, गहि) प्राप्त हूजिये और (याः) जिन रीतियों को (अदेवः) विद्वान् जनसे भिन्न (न) नहीं (आ, वरते) अच्छे प्रकार स्वीकार करता है (मद्र्यद्रिक्) मेरे सन्मुख हुए आप (तूयम्) शीघ्र (आ, याहि) प्राप्त हूजिये ॥११॥
Essence
जो रीति विद्वानों की है उसको अविद्वान् जन नहीं स्वीकार करते हैं, इससे विद्वानों और अविद्वानों का पृथक् प्रस्थान है, यह जानना चाहिये ॥११॥ इस सूक्त में इन्द्र, विद्वान्, ईश्वर, राजा और प्रजा के धर्म का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह बाईसवाँ सूक्त और चौदहवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥