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Rigveda Mandal 6 / Sukta 21 / Mantra 8

75 Sukta
12 Mantra
6/21/8
Devata- इन्द्र: Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- स्वराड्बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
स तु श्रु॑धीन्द्र॒ नूत॑नस्य ब्रह्मण्य॒तो वी॑र कारुधायः। त्वं ह्या॒३॒॑पिः प्र॒दिवि॑ पितॄ॒णां शश्व॑द्ब॒भूथ॑ सु॒हव॒ एष्टौ॑ ॥८॥

सः । तु । श्रु॒धि॒ । इ॒न्द्र॒ । नूत॑नस्य । ब्र॒ह्म॒ण्य॒तः । वी॒र॒ । का॒रु॒ऽधा॒यः॒ । त्वम् । हि । आ॒पिः । प्र॒ऽदिवि॑ । पि॒तॄ॒णाम् । शश्व॑त् । ब॒भूथ॑ । सु॒ऽहवः॑ । आऽइ॑ष्टौ ॥

Mantra without Swara
स तु श्रुधीन्द्र नूतनस्य ब्रह्मण्यतो वीर कारुधायः। त्वं ह्या३पिः प्रदिवि पितॄणां शश्वद्बभूथ सुहव एष्टौ ॥

सः। तु। श्रुधि। इन्द्र। नूतनस्य। ब्रह्मण्यतः। वीर। कारुऽधायः। त्वम्। हि। आपिः। प्रऽदिवि। पितॄणाम्। शश्वत्। बभूथ। सुऽहवः। आऽइष्टौ ॥८॥

Ashtak » 4 Adhyay » 6 Varga » 12 Mantra » 3

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Meaning
हे (वीर) दुष्टों के नाश करने और (कारुधायः) शिल्पी विद्वानों के धारण करनेवाले (इन्द्र) न्याय के स्वामी विद्वन् ! (त्वम्) आप (नूतनस्य) नवीन की (एष्टौ) सब प्रकार से यज्ञक्रिया में (सुहवः) उत्तम प्रकार ज्ञान और विज्ञानवाले (शश्वत्) निरन्तर (बभूथ) हूजिये (सः) वह आप (तु) तो (हि) निश्चय से (पितॄणाम्) पितृओं अर्थात् पालकों की (प्रदिवि) प्रकृष्ट कामना में (आपिः) व्याप्त होनेवाले हुए (ब्रह्मण्यतः) धन प्राप्ति की इच्छा करते हुओं का सत्कार करिये और उनके वचनों को (श्रुधि) सुनिये ॥८॥
Essence
वही उत्तम विद्वान् है, जो ज्ञानवृद्ध जनों से विद्यासम्बन्धी वचनों को सुन के उत्तम शिल्पजनों की रक्षा करके सदा अपेक्षित पदार्थ की प्राप्ति से सुखी होता है ॥८॥
Subject
फिर विद्वानों को क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

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