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Rigveda Mandal 6 / Sukta 21 / Mantra 5

75 Sukta
12 Mantra
6/21/5
Devata- इन्द्र: Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
इ॒दा हि ते॒ वेवि॑षतः पुरा॒जाः प्र॒त्नास॑ आ॒सुः पु॑रुकृ॒त्सखा॑यः। ये म॑ध्य॒मास॑ उ॒त नूत॑नास उ॒ताव॒मस्य॑ पुरुहूत बोधि ॥५॥

इ॒दा । हि । ते॒ । वेवि॑षतः । पु॒रा॒ऽजाः । प्र॒त्नासः॑ । आ॒सुः । पु॒रु॒ऽकृ॒त् । सखा॑यः । ये । म॒द्य॒मासः॑ । उ॒त । नूत॑नासः । उ॒त । अ॒व॒मस्य॑ । पु॒रु॒ऽहू॒त॒ । बो॒धि॒ ॥

Mantra without Swara
इदा हि ते वेविषतः पुराजाः प्रत्नास आसुः पुरुकृत्सखायः। ये मध्यमास उत नूतनास उतावमस्य पुरुहूत बोधि ॥

इदा। हि। ते। वेविषतः। पुराऽजाः। प्रत्नासः। आसुः। पुरुऽकृत्। सखायः। ये। मध्यमासः। उत। नूतनासः। उत। अवमस्य। पुरुऽहूत। बोधि ॥५॥

Ashtak » 4 Adhyay » 6 Varga » 11 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (पुरुहूत) बहुतों से प्रशंसा किये गये (पुरुकृत्) बहुतों को करनेवाले प्रतापयुक्त राजन् ! (ये) जो (हि) निश्चित (पुराजाः) पूर्व प्रकट हुए (प्रत्नासः) प्राचीन (मध्यमासः) मध्य अवस्था में हुए और (उत) भी (नूतनासः) नवीन (ते) आपके (सखायः) मित्र (आसुः) हैं उनको (इदा) इस समय तथा (वेविषतः) व्याप्त हुए और (उत) भी (अवमस्य) आधुनिक के सम्बन्धियों को आप (बोधि) चेतन करिये ॥५॥
Essence
हे मनुष्यो ! जो आप लोगों के साथ मैत्री का आचरण करते हैं, वे वृद्ध, वृद्धतर तथा मध्यम और भी तुल्य अवस्थावाले होवें, उन में मित्रता की निश्चय रक्षा करिये, ऐसा होने पर निश्चित राज्य की वृद्धि होती है, यह ही पूर्वमन्त्र में कहे हुए प्रश्नों का उत्तर है ॥५॥
Subject
फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥