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Rigveda Mandal 6 / Sukta 21 / Mantra 2

75 Sukta
12 Mantra
6/21/2
Devata- इन्द्र: Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
तमु॑ स्तुष॒ इन्द्रं॒ यो विदा॑नो॒ गिर्वा॑हसं गी॒र्भिर्य॒ज्ञवृ॑द्धम्। यस्य॒ दिव॒मति॑ म॒ह्ना पृ॑थि॒व्याः पु॑रुमा॒यस्य॑ रिरि॒चे म॑हि॒त्वम् ॥२॥

तम् । ऊँ॒ इति॑ । स्तु॒षे॒ । इन्द्र॑म् । यः । विदा॑नः । गिर्वा॑हसम् । गीः॒ऽभिः । य॒ज्ञऽवृ॑द्धम् । यस्य॑ । दिव॑म् । अति॑ । म॒ह्ना । पृ॒थि॒व्याः । पु॒रु॒ऽमा॒यस्य॑ । रि॒रि॒चे । म॒हि॒ऽत्वम् ॥

Mantra without Swara
तमु स्तुष इन्द्रं यो विदानो गिर्वाहसं गीर्भिर्यज्ञवृद्धम्। यस्य दिवमति मह्ना पृथिव्याः पुरुमायस्य रिरिचे महित्वम् ॥

तम्। ऊँ इति। स्तुषे। इन्द्रम्। यः। विदानः। गिर्वाहसम्। गीःऽभिः। यज्ञऽवृद्धम्। यस्य। दिवम्। अति। मह्ना। पृथिव्याः। पुरुऽमायस्य। रिरिचे। महिऽत्वम् ॥२॥

Ashtak » 4 Adhyay » 6 Varga » 11 Mantra » 2

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Meaning
हे राजन् ! (यः) जो (विदानः) जानता हुआ (गीर्भिः) वाणियों से (गिर्वाहसम्) उत्तम प्रकार शिक्षित वाणी के प्राप्त करानेवाले (यज्ञवृद्धम्) यज्ञ में आदर करने योग्य विद्वान् और (दिवम्) कामना करते हुए (इन्द्रम्) परमैश्वर्य्यप्रद जन को प्राप्त होकर (पृथिव्याः) पृथिवी और (यस्य) जिस (पुरुमायस्य) बहुत कपट से युक्त दुष्ट जन की (मह्ना) महिमा से (महित्वम्) महिमा को (अति, रिरिचे) बढ़ाता है और जिसकी आप (उ) तर्क-वितर्क से (स्तुषे) प्रशंसा करते हो (तम्) उस जन को हम लोग स्वीकार करें ॥२॥
Essence
जो मनुष्य अत्यन्त ऐश्वर्य के बढ़ानेवाले सूर्यके सदृश प्रकाशमान राजा को सत्य का उपदेश करें, वे महिमा को प्राप्त होकर दुःख से अतिरिक्त होते हैं ॥२॥
Subject
फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

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