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Rigveda Mandal 6 / Sukta 21 / Mantra 12

75 Sukta
12 Mantra
6/21/12
Devata- इन्द्र: Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
स नो॑ बोधि पुरए॒ता सु॒गेषू॒त दु॒र्गेषु॑ पथि॒कृद्विदा॑नः। ये अश्र॑मास उ॒रवो॒ वहि॑ष्ठा॒स्तेभि॑र्न इन्द्रा॒भि व॑क्षि॒ वाज॑म् ॥१२॥

सः । नः॒ । बो॒धि॒ । पु॒रः॒ऽए॒ता । सु॒ऽगेषु॑ । उ॒त । दुः॒ऽगेषु॑ । प॒थि॒ऽकृत् । विदा॑नः । ये । अश्र॑मासः । उ॒रवः॑ । वहि॑ष्ठाः । तेभिः॑ । नः॒ । इ॒न्द्र॑ । अ॒भि । व॒क्षि॒ । वाज॑म् ॥

Mantra without Swara
स नो बोधि पुरएता सुगेषूत दुर्गेषु पथिकृद्विदानः। ये अश्रमास उरवो वहिष्ठास्तेभिर्न इन्द्राभि वक्षि वाजम् ॥

सः। नः। बोधि। पुरःऽएता। सुऽगेषु। उत। दुःऽगेषु। पथिऽकृत्। विदानः। ये। अश्रमासः। उरवः। वहिष्ठाः। तेभिः। नः। इन्द्र। अभि। वक्षि। वाजम् ॥१२॥

Ashtak » 4 Adhyay » 6 Varga » 12 Mantra » 7

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Meaning
हे (इन्द्र) सुख और ऐश्वर्य के प्राप्त करानेवाले (सः) वह आप (पुरएता) अग्रगामी (सुगेषु) सुगम व्यवहारों में (उन) और (दुर्गेषु) दुःख से प्राप्त होने योग्यों में (पथिकृत्) मार्ग के करनेवाले (विदानः) जानते हुए (नः) हम लोगों को (बोधि) जानें और (ये) जो (अश्रमासः) थकावट से रहित (उरवः) बहुत (वहिष्ठाः) अतिशय पहुँचानेवाले हैं (तेभिः) उनके साथ (नः) हम लोगों के वा हम लोगों के लिये (वाजम्) विज्ञान को (अभि, वक्षि) प्राप्त कराइये ॥१२॥
Essence
वही विद्वान् है जो सबका मङ्गलकारी, स्वयं धर्ममार्ग को प्राप्त होकर औरों को धर्ममार्ग में चलनेवाले करे, जो सदा सत्संग करता है, वही सब से उत्तम होकर विज्ञान देने को योग्य होता है ॥१२॥ इस सूक्त में इन्द्र, विद्वान्, ईश्वर और राजा के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ॥ यह इक्कीसवाँ सूक्त और बारहवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

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