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Rigveda Mandal 6 / Sukta 21 / Mantra 10

75 Sukta
12 Mantra
6/21/10
Devata- इन्द्र: Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
इ॒म उ॑ त्वा पुरुशाक प्रयज्यो जरि॒तारो॑ अ॒भ्य॑र्चन्त्य॒र्कैः। श्रु॒धी हव॒मा हु॑व॒तो हु॑वा॒नो न त्वावाँ॑ अ॒न्यो अ॑मृत॒ त्वद॑स्ति ॥१०॥

इ॒मे । ऊँ॒ इति॑ । त्वा॒ । पु॒रु॒ऽशा॒क॒ । प्र॒य॒ज्यो॒ इति॑ प्रऽयज्यो । ज॒रि॒तारः॑ । अ॒भि । अ॒र्च॒न्ति॒ । अ॒र्कैः । श्रु॒धि । हव॑म् । आ । हु॒व॒तः । हु॒वा॒नः । न । त्वाऽवा॑न् । अ॒न्यः । अ॒मृ॒त॒ । त्वत् । अ॒स्ति॒ ॥

Mantra without Swara
इम उ त्वा पुरुशाक प्रयज्यो जरितारो अभ्यर्चन्त्यर्कैः। श्रुधी हवमा हुवतो हुवानो न त्वावाँ अन्यो अमृत त्वदस्ति ॥

इमे। ऊँ इति। त्वा। पुरुऽशाक। प्रयज्यो इति प्रऽयज्यो। जरितारः। अभि। अर्चन्ति। अर्कैः। श्रुधि। हवम्। आ। हुवतः। हुवानः। न। त्वाऽवान्। अन्यः। अमृत। त्वत्। अस्ति ॥१०॥

Ashtak » 4 Adhyay » 6 Varga » 12 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (प्रयज्यो) यत्न से मेल करने को योग्य (पुरुशाक) बहुत सामर्थ्य से युक्त परमेश्वर ! जो (इमे) ये (जरितारः) विद्या के लाभ की स्तुति करनेवाले जन (अर्कैः) सत्कारों से (त्वा) आपको (अभि, अर्चन्ति) सब ओर से सत्कार करते हैं। हे (अमृत) नाशरहित ! जिन (त्वत्) आप से (त्वावान्) आपके सदृश (अन्यः) अन्य दूसरा (न) नहीं (अस्ति) है वह (हुवानः) प्रशंसा करते हुए आप उन (हुवतः) स्तुति करते हुओं को और (हवम्) उच्चारित शब्द को (आ) सब प्रकार (श्रुधि) सुनिये (उ) और उन को स्वीकार करिये ॥१०॥
Essence
हे मनुष्यो ! जैसे विद्वान् जन परमात्मा की स्तुति और प्रार्थना करके उपासना करते हैं, वैसे आप भी उपासना करो और उसके सदृश वा उससे अधिक कोई भी नहीं है, ऐसा जानो ॥१०॥
Subject
फिर मनुष्यों को किसकी उपासना करनी चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥