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Rigveda Mandal 6 / Sukta 20 / Mantra 5

75 Sukta
13 Mantra
6/20/5
Devata- इन्द्र: Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
म॒हो द्रु॒हो अप॑ वि॒श्वायु॑ धायि॒ वज्र॑स्य॒ यत्पत॑ने॒ पादि॒ शुष्णः॑। उ॒रु ष स॒रथं॒ सार॑थये क॒रिन्द्रः॒ कुत्सा॑य॒ सूर्य॑स्य सा॒तौ ॥५॥

म॒हः । द्रु॒हः । अप॑ । वि॒श्वऽआ॑यु । धा॒यि॒ । वज्र॑स्य । यत् । पत॑ने । पादि॑ । शुष्णः॑ । उ॒रु । सः । स॒ऽरथ॑म् । सार॑थये । कः॒ । इन्द्रः॑ । कुत्सा॑य । सूर्य॑स्य । सा॒तौ ॥

Mantra without Swara
महो द्रुहो अप विश्वायु धायि वज्रस्य यत्पतने पादि शुष्णः। उरु ष सरथं सारथये करिन्द्रः कुत्साय सूर्यस्य सातौ ॥

महः। द्रुहः। अप। विश्वऽआयु। धायि। वज्रस्य। यत्। पतने। पादि। शुष्णः। उरु। सः। सऽरथम्। सारथये। कः। इन्द्रः। कुत्साय। सूर्यस्य। सातौ ॥५॥

Ashtak » 4 Adhyay » 6 Varga » 9 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे राजन् ! आप से (वज्रस्य) शस्त्र और अस्त्र विशेष के (पतने) गिरने में जो (द्रुहः) द्रोह करनेवालों को (अप, पादि) दूर करे जिससे (महः) अत्यन्त (विश्वायु) सम्पूर्ण जीवन (धायि) धारण किया जाये और (यत्) जो (इन्द्रः) शत्रुओं का नाशक सेना का स्वामी (सारथये) वाहन चलानेवाले के लिये (सरथम्) वाहन के सहित वर्त्तमान को (सूर्यस्य) सूर्य के (सातौ) उत्तम प्रकार विभाग में (कुत्साय) वज्र के प्रहार के लिये (उरु) बहुत (कः) करे (सः) वह (शुष्णः) बलिष्ठ का सम्बन्धी सत्कार करने योग्य है ॥५॥
Essence
राजा को चाहिये कि द्रोह आदि दोषों का त्याग करके ब्रह्मचर्य आदि से सम्पूर्ण जनों को अधिक अवस्थावाले करके, रथ आदि सेना के अङ्गों को सूर्य के तुल्य प्रकाशित करके, सत्य और असत्य के विभाग से प्रजाओं का पालन करे ॥५॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥