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Rigveda Mandal 6 / Sukta 20 / Mantra 4

75 Sukta
13 Mantra
6/20/4
Devata- इन्द्र: Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
श॒तैर॑पद्रन्प॒णय॑ इ॒न्द्रात्र॒ दशो॑णये क॒वये॒ऽर्कसा॑तौ। व॒धैः शुष्ण॑स्या॒शुष॑स्य मा॒याः पि॒त्वो नारि॑रेची॒त्किं च॒न प्र ॥४॥

श॒तैः । अ॒प॒द्र॒न् । प॒णयः॑ । इ॒न्द्र॒ । अत्र॑ । दश॑ऽओणये । क॒वये॑ । अ॒र्कऽसा॑तौ । व॒धैः । शुष्ण॑स्य । अ॒शुष॑स्य । मा॒याः । पि॒त्वः । न । अ॒रि॒रे॒ची॒त् । किम् । च॒न । प्र ॥

Mantra without Swara
शतैरपद्रन्पणय इन्द्रात्र दशोणये कवयेऽर्कसातौ। वधैः शुष्णस्याशुषस्य मायाः पित्वो नारिरेचीत्किं चन प्र ॥

शतैः। अपद्रन्। पणयः। इन्द्र। अत्र। दशऽओणये। कवये। अर्कऽसातौ। वधैः। शुष्णस्य। अशुषस्य। मायाः। पित्वः। न। अरिरेचीत्। किम्। चन। प्र ॥४॥

Ashtak » 4 Adhyay » 6 Varga » 9 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) देनेवाले राजन् ! आप जो (पणयः) व्यवहारों के जाननेवाले (शतैः) सौ सङ्ख्या से परिमित वा असङ्ख्य (वधैः) वधों से (अत्र) इस राजव्यवहार में (अपद्रन्) नहीं द्रवित होते हैं और (अर्कसातौ) अन्न आदि के विभाग में (दशोणये) दश न्यून जिससे उस (कवये) विद्वान् के लिये (अशुषस्य) शोषण से रहित (शुष्णस्य) बलिष्ठ की (मायाः) बुद्धियों को (पित्वः) अन्न आदि (किम्, चन) कुछ भी (न) नहीं (प्र, अरिरेचीत्) अच्छे प्रकार अलग करता है, उनका सत्कार करिये अर्थात् प्रशंसा करिये ॥४॥
Essence
हे मनुष्यो ! जो धर्ममार्ग का त्याग करके उन्मार्ग में चलते हैं, उनको राजा नित्य दण्ड देवे और दो दश इन्द्रियों से अधर्म का त्याग करके धर्म का आचरण करते हैं, उन का निरन्तर सत्कार करे ॥४॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥