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Rigveda Mandal 6 / Sukta 20 / Mantra 2

75 Sukta
13 Mantra
6/20/2
Devata- इन्द्र: Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
दि॒वो न तुभ्य॒मन्वि॑न्द्र स॒त्रासु॒र्यं॑ दे॒वेभि॑र्धायि॒ विश्व॑म्। अहिं॒ यद्वृ॒त्रम॒पो व॑व्रि॒वांसं॒ हन्नृ॑जीषि॒न्विष्णु॑ना सचा॒नः ॥२॥

दि॒वः । न । तुभ्य॑म् । अनु॑ । इ॒न्द्र॒ । स॒त्रा । अ॒सु॒र्य॑म् । दे॒वेभिः॑ । धा॒यि॒ । विश्व॑म् । अहि॑म् । यत् । वृ॒त्रम् । अ॒पः । व॒व्रि॒ऽवांस॑म् । हन् । ऋ॒जी॒षि॒न् । विष्णु॑ना । स॒चा॒नः ॥

Mantra without Swara
दिवो न तुभ्यमन्विन्द्र सत्रासुर्यं देवेभिर्धायि विश्वम्। अहिं यद्वृत्रमपो वव्रिवांसं हन्नृजीषिन्विष्णुना सचानः ॥

दिवः। न। तुभ्यम्। अनु। इन्द्र। सत्रा। असुर्यम्। देवेभिः। धायि। विश्वम्। अहिम्। यत्। वृत्रम्। अपः। वव्रिऽवांसम्। हन्। ऋजीषिन्। विष्णुना। सचानः ॥२॥

Ashtak » 4 Adhyay » 6 Varga » 9 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (ऋजीषिन्) सरल धर्म से युक्त (इन्द्र) राजन् ! जैसे सूर्य (विष्णुना) व्यापक जगदीश्वर वा बिजुली से (सचानः) मिलनेवाला (यत्) जिसको (अपः) जलों के (वव्रिवांसम्) विभाग करते हुए (वृत्रम्) आच्छादन करनेवाले (अहिम्) मेघ को (हन्) नाश करता है, वैसे (देवेभिः) विद्वानों से (तुभ्यम्) आपके लिये (सत्रा) सत्य से (दिवः) कामना करते हुए (न) जैसे वैसे (विश्वम्) सम्पूर्ण (असुर्यम्) मूर्ख पापी जनों का ऐश्वर्य (अनु, धायि) पीछे धारण किया जाता है ॥२॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जैसे सूर्य आठ महीने में जल के रसों को आकर्षण के द्वारा हरण करके चातुर्मास्य में वर्षाता है, वैसे ही राजा आठ महीने करों को ग्रहण कर अभय की वृष्टि करके प्रजा का पालन करे ॥२॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥