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Rigveda Mandal 6 / Sukta 20 / Mantra 12

75 Sukta
13 Mantra
6/20/12
Devata- इन्द्र: Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
त्वं धुनि॑रिन्द्र॒ धुनि॑मतीर्ऋ॒णोर॒पः सी॒रा न स्रव॑न्तीः। प्र यत्स॑मु॒द्रमति॑ शूर॒ पर्षि॑ पा॒रया॑ तु॒र्वशं॒ यदुं॑ स्व॒स्ति ॥१२॥

त्वम् । धुनिः॑ । इ॒न्द्र॒ । धुनि॑ऽमतीः । ऋ॒णोः । अ॒पः । सी॒राः । न । स्रव॑न्तीः । प्र । यत् । स॒मु॒द्रम् । अति॑ । शू॒र॒ । पर्षि॑ । पा॒रय॑ । तु॒र्वश॑म् । यदु॑म् । स्व॒स्ति ॥

Mantra without Swara
त्वं धुनिरिन्द्र धुनिमतीर्ऋणोरपः सीरा न स्रवन्तीः। प्र यत्समुद्रमति शूर पर्षि पारया तुर्वशं यदुं स्वस्ति ॥

त्वम्। धुनिः। इन्द्र। धुनिऽमतीः। ऋणोः। अपः। सीराः। न। स्रवन्तीः। प्र। यत्। समुद्रम्। अति। शूर। पर्षि। पारय। तुर्वशम्। यदुम्। स्वस्ति ॥१२॥

Ashtak » 4 Adhyay » 6 Varga » 10 Mantra » 7

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) सब के पालन करनेवाले (धुनिः) शत्रुओं के कम्पानेवाले (त्वम्) आप (धुनिमतीः) शब्द करती हुई प्रजायें (सीराः) नाडियाँ तथा (अपः) जल और (स्रवन्तीः) नदियाँ (समुद्रम्) समुद्र वा अन्तरिक्ष को (न) जैसे (स्वस्ति) सुख को (ऋणोः) प्रसिद्ध कीजिये और हे (शूर) वीर ! (यत्) जो आप (तुर्वशम्) शीघ्र वश को प्राप्त होनेवाले (यदुम्) यत्नशील मनुष्य का (प्र, अति पर्षि) प्रसिद्ध अत्यन्त पालन करते हो, वह आप हम लोगों को (पारया) दुःख से पार कीजिये ॥१२॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे राजन् ! आप मङ्गल और सुख के देनेवाले शब्दों से युक्त और आनन्दित प्रजाओं को करें, जैसे नदियाँ समुद्र को प्राप्त होकर स्थिर होती हैं, वैसे प्रजायें आपको प्राप्त होकर निश्चल होवें, ऐसा करिये ॥१२॥
Subject
फिर वह क्या करे, इस विषय को कहते हैं ॥